कवि की कहानी
शब्दों के बहुत खूब सुन्दर जाल
बुनते हो
झूठे सपनो को पन्नो पर सच करते
हो
आसमान से तारे तोड़ लाने का वादा
करते हो
चाँद को धरती पर उतारने के कोशिश
करते हो
कवि हो या आशिक़, इसलिए ऐसी बात
करते हो
ज़मीन पर उतर आयो, क्यों हवाओं
में उड़ते हो
मामूली कंगन दे न सके, तारो को
तोड़ने के बात करते हो
घर मैं बिजली ग़ुल है, चाँद को
उतारने की बात करते हो
कल से छत टपक रही, सुहानी बरसात
की बात करते हो
कवि या आशिक़ हो इसलिए ऐसी बात
करते हो
घर परिवार नहीं चलता इनसे, क्यों
बेकार की बात करते हो
जाओ कुछ कर लो, क्यों कलम कागज़
बर्बाद करते हो
दुनिया को सपने दिखाते, अपनों
के सपनो तो अधूरे करते हो
किराये के मकान में बैठ कर महलो
की तामीर करते हो
कवि या आशिक़ हो इसलिए ऐसी बात
करते हो
राजा महारजा नहीं रहे अब किस
से आशीवार्द के उम्मीद करते हो
वक़्त नहीं किसी के पास, व्यर्थ
में दुनिया से दाद की उम्मीद करते हो
तुम कलम के सिपाही हो, हमेशा
सपनो की दुनिया की उम्मीद रखते हो
अपनी उम्मीद का दीया जलाये, तुम
किसी से कहा कोई उम्मीद रखते हो
कवि या आशिक़ हो इसलिए ऐसी बात
करते हो
आपका अपना अनुराग "परदेसी"
१७/०४/२०१४
kavi or kavita.... ek ke biura na ek adhura hai !!
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