Wednesday, 9 April 2014

मेरी पतंग

मेरी पतंग 

“ऐसी उड़ी मेरे घर से मेरी पतंग के फिर कभी घर लौट के न आ पाई” 

कड़कती धुप में भी,
हल्की बूंदाबांदी में भी,
झूमती आंधी में भी,
क्या जवानी में खूब उड़ी मेरी सतरंगी पतंग
मेरे को भी अपने संग संग ले उड़ी मेरी पतंग
खबर नहीं कब सात समुन्दर पार कर गयी मेरी पतंग 

“ऐसी उड़ी मेरे घर से मेरी पतंग के फिर कभी घर लौट के न आ पाई”

इतनी ऊँची उड़ी, उड़ती गयी मेरी पतंग,
जब उडी तब मेरी उमंग थी मेरी पतंग
कितनी सुंदर कितनी रंगबिरंगी थी पतंग
सब की देर सवेर, पर मेरी लौट के न आई पतंग

“ऐसी उड़ी मेरे घर से मेरी पतंग के फिर कभी घर लौट के न आ पाई”

शायद उसको बनाने वालो हाथो को भूल गयी या घर का रास्ता भूल गयी
दीवार पे लगे कील को अब भी है,पर हमारी उम्मीद भी अब हमसे छूट गयी
कंपकंपाते हाथो को लगता है, उनकी बनाई तामीर उनके ही हाथो से टूट गयी
झूठी आस में उसकी डोर को अभी भी थामे बैठे, कही उसकी डोर ही टूट न गयी

“ऐसी उड़ी मेरे घर से मेरी पतंग के फिर कभी घर लौट के न आ पाई”

आज सुबह छत पर तार तार पड़ी मिली मेरी पतंग
डरी हुई, थकी हुई, बेजान सी, बेरंग सी मेरी पतंग
कितने दिनों के बाद लौट आयी थी मेरी पतंग
हमने चुपचाप दीवार पर लगे कील पर टांग दी पतंग

“ऐसी उड़ी मेरे घर से मेरी पतंग के फिर कभी घर लौट के न आ पाई”

आपका अपना अनुराग "परदेसी" ०८/०४/१४

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