Monday, 14 April 2014

उसकी मौत हो गयी

इंसानियत की मौत

आज सुबह अखबार के किसी कोने में पढ़ा की इंसानियत की मौत हो गयी
पढ़ के मैं चौंका नही, चलो अच्छा है बहुत परेशान थी चैन की नींद सो गयी

सुना बड़े दिनों से बीमार थी, कुछ चंद लोगो की थकी हुई सांसो के सहारे जिंदा थी 
कोई शोक में नही है, क्यूँकि किसी को पता ही नही था के वो अब तक जिंदा थी 
हम सब ने धीरे धीरे तड़पा तड़पा के मारा था उसको, ना जाने फिर कैसे जिंदा थी
याद है उसके अन्तिम दिनों में उसकी गीली आँखें, हम सब को देख कितना शर्मिंदा थी

आज सुबह अखबार के किसी कोने में पढ़ा की इंसानियत की मौत हो गयी
पढ़ के मैं चौंका नही, चलो अच्छा है बहुत परेशान थी चैन की नींद सो गयी

बचपन में कितना हँसती, हर घर,हर गली में बिखरी मिलती थी 
कभी लालच की खाँसी और जलन के बुखार से बीमार हो जाती थी 
माँ कि दियी हुई संतोष और प्यार कि दवाई से तुरंत ठीक जाती थी 
तबीयत ज्यादा बिगड़ती तो पिता की फटकार के टीके से सही हो जाती थी

आज सुबह अखबार के किसी कोने में पढ़ा की इंसानियत की मौत हो गयी
पढ़ के मैं चौंका नही, चलो अच्छा है बहुत परेशान थी चैन की नींद सो गयी

इंसानियत फिर जवानी में कदम रख् कर, तो दोस्तों यारों के साथ जवान हुई
अपने नशे में, ग़रूर में, बिना किसी के लिहाज और परवाह के परवान हुई
माता पिता गुरु सब हालात से मजबूर, उनके सामने जख्मी और लहूलुहान हुई 
भूल गयी सब संस्कार और सम्मान, देखते देखते आँखों के सामने कुर्बान हुई
  
आज सुबह अखबार के किसी कोने में पढ़ा की इंसानियत की मौत हो गयी
पढ़ के मैं चौंका नही, चलो अच्छा है बहुत परेशान थी चैन की नींद सो गयी

झूठ, धोखे की बीमारी ने ऐसा पकड़ा की उसका शरीर ज़हर का प्याला  हो गया
बुढ़ापे की दहलीज़ पर पहुँचने  से पहले ही शरीर अधमरा और काला हो गया
कुछ भलो ने उसे बचाने की नाकाम कोशिश की उनका समाज से निकाला हो गया
दुनिया में आज से इंसानियत का धंधा बंद है, क्योकि उसका आज पूरा दिवाला हो गया

आज सुबह अखबार के किसी कोने में पढ़ा की इंसानियत की मौत हो गयी
पढ़ के मैं चौंका नही, चलो अच्छा है बहुत परेशान थी चैन की नींद सो गयी


Aapka apna Anurag “Pardesi”

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