Thursday, 10 April 2014

बाबु जी की कुर्सी

बाबु जी की कुर्सी 

आज मुन्ने की ज़िद करने पर माँ ने उसको पुरानी कुर्सी बाहर निकाल कर दी थी 
कब से  मैं, पीछे वाले कमरे में, धूल भरी, पुराने सामान के साथ अधमरी पड़ी थी 
बरसो के बाद मैं अपने पुराने  कोने में बैठक के अंदर फिर ख़ुशी से तन के खड़ी थी 
पुरानी यादो के मंजर के कहानी, जैसे कल की बात हो, मेरे सामने दीवार पर जड़ी थी

मैं हूँ बाबु  जी की कुर्सी

शहर की  सब से आलिशान और ऊँची दुकान में जब बाबु जी मुझे लेने आये थे
मुझे अखरोट की लकड़ी से तराशने वाले युसूफ चाचा से वो लम्बे समय बतियाये थे 
अपना घर छोड़ने पर उदास थी, पर थोड़ी ख़ुश की  मेरे कदरदान मुझे लेने आये थे
धीरे धीरे बहुत प्यार से युसूफ चाचा  मुझे ठेले पर बिठा कर विदा करने आये थे

मैं हूँ बाबु  जी की कुर्सी

बाबु जी के बंगले के द्वार पर उनके सारे परिवार वाले मुझे देखने आये थे
बाबु जी मुझे अपने सामने घर की बैठक के अंदर बड़े प्यार से सजा आये थे
मैं बाबु जी की चहेती थी, उनकी इजाजत बिना कोई भी मेरे पर कहां बैठ पाये थे 
सुबह चाय और अखबार, श्याम को रेडियो मैं और मेरे साथ बाबू जी सुनते आये थे 

मैं हूँ बाबु  जी की कुर्सी 

रोज की तरह आज सुबह मैं बाबु  जी की अखबार थामे उनके इंतिजार में थी
एक लम्बे सन्नाटे के बाद सारे घर में सिर्फ घर वालो की चीख और पुकार थी
बाबू जी के गुजर जाने के बाद बैठक में अब विदेशी महंगे सामान की भरमार थी
मेरी जगह लेने अब एक मरे जानवर के चमड़े से सिली एक नयी कुर्सी तैयार थी

मैं हूँ बाबु  जी की कुर्सी 

बाबु जी के दुलारे पोते की जिद वाबजूद, मुझे घरवाले  अँधेरी कोठरी में छोड़ आये थे
मेरे जैसे कितने जाने जहां बरसो से क़ैद, उन सब की ज़िन्दगी में ऐसे मोड़ आये थे
इस अकेलेपन से, मुझे महसूस हुआ जैसे पीपल के नीचे मरने के लिए छोड़ आये थे  
आज फिर पोते की जिद पर घरवाले जिस कोने से मेरी कहानी शुरु हुई वही पर ले आये थे  
   
मैं हूँ बाबू जी की कुर्सी 

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १०/०४/२०१४



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