“हर एक की ज़िन्दगी की किताब उस के अन्दर किसी कोने में पड़ी है
खुद की लिखी हुई ,ख़ुद की पढ़ी हुई, अंदर किसी कोने में पड़ी है “
किसी की पूरी बंद ,किसी की थोड़ी बंद, किसी की ज़रा सी खुली पड़ी है I
हमारी असली तस्वीर, सच्ची कहानी इस के पन्नो पे लिखी पढ़ी है I
तुम्हारे दर्द और आंसू, तुम्हारे किस्से और राज, तुम्हारी सच्चाई में लिपटी पड़ी है I
सब कहते हमारी ज़िन्दगी खुली किताब, हम जानते कहा यह खुली पड़ी है I
“हर एक की ज़िन्दगी की किताब उस के अन्दर किसी कोने में पड़ी है
खुद की लिखी हुई ,ख़ुद की पढ़ी हुई, अंदर किसी कोने में पड़ी है “
किसी की थोड़ी रंगीन और नमकीन , किसी की थोड़ी काली,थोड़ी सफ़ेद पड़ी है I
हिम्मत नहीं उसको बाज़ार में रखने की , इसलिए दिल की अलमारी में पड़ी है I
रिश्ते टूट न जाये, अपने रूठ न जाये, अच्छा है बंद है , बंद पड़ी है
डरते है कही पन्ने खुल न जाये ,इसलिए अच्छा है जब तक उस पे धूल पड़ी है I
“हर एक की ज़िन्दगी की किताब उस के अन्दर किसी कोने में पड़ी है
खुद की लिखी हुई , ख़ुद की पढ़ी हुई, अंदर किसी कोने में पड़ी है”
दूसरो की लिखी किताबे बहुत पढ़ी, पर तुम्हारी किसी ने नहीं पढ़ी है
कुछ तो है जो छुपाते हो, मंद मंद मुस्कुराते हो, किसी ने नहीं पढ़ी है
क्या बिलकुल ही फीकी है या बहुत तीखी है, किसी ने नहीं पढ़ी है
इशारो में बता तो दो,कुछ समझा तो दो, किसी ने नहीं पढ़ी है
“हर एक की ज़िन्दगी की किताब उस के अन्दर किसी कोने में पड़ी है
खुद की लिखी हुई , ख़ुद की पढ़ी हुई, अंदर किसी कोने में पड़ी है”
कभी कभी सोचते है कुछ वक़्त बीत जाने के बाद अपना अफसाना लिखेगे ?
खाली पैमाना भर के , होश में बैठ ,तब पुरा का पुरा तराना लिखेगे ?
यह वादा है के अलविदा कहने के पहले सारा का सारा लिखगे ?
कभी कभी सोचते है कुछ वक़्त बीत जाने के बाद अपना अफसाना लिखेगे ?
“हर एक की ज़िन्दगी की किताब उस के अन्दर किसी कोने में पड़ी है
खुद की लिखी हुई , ख़ुद की पढ़ी हुई, अंदर किसी कोने में पड़ी है”
आपका अपना अनुराग "परदेसी" ३०/३/१४
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