Wednesday, 26 March 2014

एक में दुसरे को ढूंढते है

एक में दुसरे को ढूंढते है
ना जाने हम क्यों एक आदमी में दुसरे आदमी को ढूंढते है
भगवान ने तराशा सब को अलग, फिर न जाने क्यों ढूंढते है
किसी कि बुराई और किसी की अच्छाई किसी और में ढूंढते है
राम में कृष्ण की मस्ती, और कृष्ण में राम जैसे बड़ा भाई ढूंढते है
सीता में राधा का प्यार और राधा में सीता का बलिदान ढूंढते है

अपनी नई नवेली बीवी में अपनी माँ को ढूंढते है
अपने पति में अपने पिता कि पुरानी तस्वीर को ढूंढते है
छोटो में बड़ो सी अक्कल और बडों में छोटों की मासूमीत ढूंढते है
नए मिलें दोस्त में पुराने बिछड़े दोस्त के साथ बिताये पल ढूंढते है
ना जाने हम क्यों एक आदमी में दुसरे आदमी को ढूंढते है

नदी के पानी में नमक और सागर के पानी में मिठास ढूंढते है
चाँद में सूरज की गर्मी और सूरज में चाँद की शीतलता ढूंढते है
बगीचे में खूबसूरत दिखने वाले फूलो में खुश्बू को ढूंढते है
पत्थर दिल हसींन चहरो में मौम जैसे पिगलते दिल ढूंढते है
ना जाने हम क्यों एक आदमी में दुसरे आदमी को ढूंढते है

अपने बच्चो में अपने बचपन की पुरानी परछाई ढूंढते है
अपने अधूरे सपनो को पूरा होने की चाहा उनमे ढूंढते है
एक कवी अपनी बेटी में अपनी कलम की स्याही ढूंढते है
पुराने फौज़ी अपने कमजोर बेटे के दिल में सिपाही ढूंढते है
ना जाने हम क्यों एक आदमी में दुसरे आदमी को ढूंढते है

कवि का बेटा सिपाही और सिपाही का बेटा कवि हो,क्यों नही समझते है
सीता राम की और कृष्ण राधा का है ना जाने ये क्यों नही समझते है
बीवी को बीवी, माँ को माँ, और छोटे को छोटा क्यों नही समझते है
अगर हम सब ऐसा सोचे समझे,तो फिर कहा अपने रिशते टूटते  है
ना जाने हम क्यों एक आदमी में दुसरे आदमी को ढूंढते  है

आपका अपन अनुराग "परदेसी" २५/३/२०१४


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