Sunday, 16 March 2014

                         कहानी

बचपन में हम सब ने सुने कितने किस्से  और कितने  कहानी
कुछ माँ के मुँह से और कुछ बूढ़ी नानी के ज़ुबानी
किसी में थी परिया और किसे में महलो के राजा रानी
कुछ झूटी कुछ सची पर उनको सुन कर नीद आती थी  सुहानी
बचपन में हम सब ने सुने कितने किस्से  और कितने  कहानी

अब तो इतना वक़्त गुजर गया पर अब  तक सुन रहा हूँ कहानी
कभी बाज़ारों में कभी महफ़िलों में पर  लगती सब की  सब अन्जानी
किसको सच मानू और किसको मानू  झूठा बहुत है मुझे परेशानि 
असमंजस में हूँ किस पर करू विश्वास और किस पे ढालू पानी
बचपन में हम सब ने सुने कितने किस्से  और कितने  कहानी

आज के ज़माने में सब हदे पार कर गयी सफ़ेद झूठी कहानी
छोटी से चाह के लिए लोग अपनों की  ही लगा देते है क़ुरबानी
सिर्फ चन्द सिक्कों  की लिए ही लोग भूल जाते है दोस्ती  पुरानी
रिश्तो तक को तोलती है तराजू  में यह अब दुनिया बेगानी
बचपन में हम सब ने सुने कितने किस्से  और कितने  कहानी

ऐसा लगता है हमारे जीवन में अब सब से अहम है कहानी
होश में आने पर सर की ऊपर से गुजर चूका होता है पानी
आखरी दिनों जब नातियों को सुना रहे  होते है किस्से  और कहानी
तब फिर लौट आती है बचपन कि परिया और महलों की राजा रानी
बचपन में हम सब ने सुने कितने किस्से  और कितने  कहानी


" यही है दोस्तों आज के इंसान की  सच्ची कहानी"


आपका अपना अनुराग  ०८/०१/२०१४

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