कहानी
बचपन में हम
सब ने सुने
कितने किस्से और
कितने कहानी
कुछ माँ के
मुँह से और
कुछ बूढ़ी नानी
के ज़ुबानी
किसी में थी
परिया और किसे
में महलो के
राजा रानी
कुछ झूटी कुछ
सची पर उनको
सुन कर नीद
आती थी सुहानी
बचपन में हम
सब ने सुने
कितने किस्से और
कितने कहानी
अब तो इतना
वक़्त गुजर गया
पर अब तक सुन
रहा हूँ कहानी
कभी बाज़ारों में कभी
महफ़िलों में पर लगती
सब की सब अन्जानी
किसको सच मानू
और किसको मानू झूठा
बहुत है मुझे
परेशानि
असमंजस में हूँ
किस पर करू
विश्वास और किस
पे ढालू पानी
बचपन में हम
सब ने सुने
कितने किस्से और
कितने कहानी
आज के ज़माने
में सब हदे
पार कर गयी
सफ़ेद झूठी कहानी
छोटी से चाह
के लिए लोग
अपनों की ही लगा
देते है क़ुरबानी
सिर्फ चन्द सिक्कों की लिए
ही लोग भूल
जाते है दोस्ती पुरानी
रिश्तो तक को
तोलती है तराजू में
यह अब दुनिया बेगानी
बचपन में हम
सब ने सुने
कितने किस्से और
कितने कहानी
ऐसा लगता है
हमारे जीवन में
अब सब से
अहम है कहानी
होश में आने
पर सर की
ऊपर से गुजर
चूका होता है
पानी
आखरी दिनों जब
नातियों को सुना
रहे होते
है किस्से और
कहानी
तब फिर लौट
आती है बचपन
कि परिया और
महलों की राजा
रानी
बचपन में हम
सब ने सुने
कितने किस्से और
कितने कहानी
" यही है
दोस्तों आज के
इंसान की सच्ची कहानी"
आपका अपना अनुराग ०८/०१/२०१४
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