Friday, 21 March 2014

ज़िन्दगी की सुबह और शाम

ज़िन्दगी की सुबह और शाम

“सुबह हो गयी, अब शाम ढलने को है”

ज़िन्दगी की आने वाली सुबह और दूसरी तरफ ढलने वाली शाम को देखता हूँ
सुबह सुबह बच्चों को स्कूल और बडों को अपने काम पर जाता देखता हूँ
एक तरफ मुस्कराते चेहरे और दूसरी तरफ़ माथे की शिकन देखता हूँ
एक दूसरे के कंधो पर रखे हाथ और दूसरी तरफ जेब में पड़े गीले हाथ देखता हूँ
एक पर लदे बस्ते का बोज और दूसरी तरफ खाली पर फिर भी झुके कंधे देखता हूँ
बेफिक्री और फ़िक्री दोनों को आमने सामने अपने नजरों से देखता हूँ
एक तरफ़ शोर और दूसरी तरफ़ खामोशी, ना जाने क्या क्या सोचता हूँ
एक तरफ़ बरसों पुराना आइना है और एक तरफ सच्चाई, सोचता हूँ.
बीते हुए कल और आने वाले कल के बीच में खड़ा होकर फिर सोचता हूँ
ज़िन्दगी की आने वाली सुबह और दूसरी तरफ ढलने वाली शाम को देखता हूँ


दिन ढलते ही सब पंछी लंबी कतारों में अपने घोंसलों की और उड़ने लगे है
बचपन में घंटो दौड़ा, अब हम घडी को देख देख कर चलने भर लगे है
पहले कुछ भी खा लेते अब कुछ भी खाने से पहले चार बार सोचने लगे है
अभी आठ भी नहीं बजे और वो सब अपनी आँखों को मलने लगे है
एक हम है जो लेटे लेटे हर रोज की तरह तारो को गिनने लगे है
और हम तो सुबह होने से पहले ही पौधो को जगा के पानी देने लगे है
दिन ढलते ही सब पंछी लंबी कतारों में अपने घोंसलों की और उड़ने लगे है


ज़िन्दगी की रेलगाड़ी अब थोड़ी धीमी धीमी होने लगी है
ऐसा लगता है कुछ दिनों रुक रुक कर बैलगाड़ी होने लगी है
कुछ मुसाफिर पहले उतर गए, इसलिए अब खाली होने लगी है
सीट के नंबर मिट गए,अब गाड़ी की सीटे भी पुरानी होने लगी है
सब तरफ चुप्पी है, सिर्फ रेलग़ाडी की धक् धक् सुनाई देने लगी है
कुछ सो गए, कुछ अभी भी जागे , काली रात और अँधेरी होने लगी है
उजाला हो गया, कुछ नए राहगीरो से रेलगाड़ी फिर भरने लगी है
चंद बची हुई सवारी, अपने को समेट उतरने की त्यारी करने लगी है
ज़िन्दगी की रेलगाड़ी अब थोड़ी धीमी धीमी होने लगी है


  कहते है शायर अनुराग "परदेसी "   “सुबह हो गयी, अब शाम ढलने को है”

आपका अपना अनुराग "परदेसी" २१/३/२०१४

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