Sunday, 14 December 2014

सरहद के पार

सरहद के पार
सरहद के उस पार जाने की मनाही है,
सरकार ने फरमान जारी किया !
परिंदा भी पर ना मार पाये ,
ऐसा पुख्ता इंतजाम किया !
आजकल बहुत सख्त पहरा ,
देखते ही गोली मारने का आदेश दिया !
निड़र नदी तो सरहद पार कर गयी ,
फरमान को अपने साथ बहा ले गयी !
मस्त हवा को नहीं कर सका कोई क़ैद,
वो पहरे को नाकाम कर गयी !
चिड़िया भी आँख दिखाने से बाज ना आई,
गोली से बचते बचाते उड़कर पार हो गयी !
सरहद के उस पार जाने की मनाही है ,
सरकार ने फरमान जारी किया !
हमारी तमन्ना बरसो के बाद पूरी,
एक रात हमारी कोशिश भी कामयाब हुई!
एक तस्वीर बना रखी थी ज़हन में,
उस पार जाके तस्वीर आईने की तरह साफ हुई !
सब फासले मिट गए,
दिल की धड़कन उन से दो चार हुई !
सरहद के उस पार जाने की मनाही है,
सरकार ने फरमान जारी किया !
अपने यहाँ की मिटटी थोड़ी उधर बिखेर आये,
वहाँ की मिटटी अपनी पोटली में यहाँ ले आये !
हम सरहदो का आज तोड़ आये,
दूरियों को कोसो दूर छोड़ आये,
नदी,हवा,चिड़िया की फेहरिस्त में अपना नाम जोड़ आये !
सरहद के उस पार जाने की मनाही है,
सरकार ने फरमान जारी किया !
सरहद पार से आपका अपना अनुराग "परदेसी" १३/१२/१४
Sarhad ke paar
Sarhad ke us paar jane ki manahi hai,
Sarkar ne farman jari kiya !
Parinda bhi par na mar paye,
Aisa pukhta intejam kiya !
Aajkal bahut sakht pehra,
Dekhte hi goli marne ka aadesh diya !
Sarhad ke us paar jane ki manahi hai,
Sarkar ne farman jari kiya !
Nidar nadi to sarhad par gayi
Farman ko apne sath baha le gayi
Mast hawa ko nahi kar saka koi qaid
Wo pehre ko nakam kar gay!
chidiya bhi aankh dikhane se baaj na aayi,
goli se bachte bachate udkar par ho gayi
Sarhad ke us paar jane ki manahi hai,
Sarkar ne farman jari kiya !
Hamari tamana barso ke bad puri,
Ek raat hamari koshish bhi kamyab hui!
Ektasveer bana rakhi thee zehen me,
Ab jake tasveer aine ke tarah saf hui !
Sab fasle mit gaye,
Dil ke dhdkan unse do char hui!
Sarhad ke us paar jane ki manahi hai,
Sarkar ne farman jari kiya !
Apne yaha ki mitti thodi waha bikhar aaye,
waha ke mitti apni potli me yaha le aaye !
Hum sarahdo ka aaj tod aaye,
Duriyo ko koso dur chod aaye,
Nadi, hawa,chidiya ki farisht me apna nam jod aaye !
Sarhad ke us paar jane ki manahi hai,
Sarkar ne farman jari kiya !

भूरी आँखों वाला लड़का

भूरी आँखों वाला लड़का

बचपन का रंग था गोरा ,
और गालो पर थोड़ी सी लाली !
बाल घुंघराले उसके,
आँखें भूरी बिल्ली वाली !
न था उसको कोई फ़िक्र ना फाका,
उसकी मुस्कान सब से निराली !

अब्बा ला के देते कपडे लत्ते ,
अम्मा के हाथो की सालन और रोटी !
घर के पीछे वाली गली में खेलते हम ,
मैं, बड़ा भाई और बहन छोटी !
मैं नसीब वाला था ,
कितनो की किस्मत थी अपने सी खोटी !

एक दिन उस्ताद जी ने मुझे अपने पास बुलाया,  
कमरे में बैठा कर बहुत प्यार जताया,
सुनाई पूरी दुनिया की कहानी और घंटो वक़्त  बिताया,  
हाथ फेर कर मेरे सर पर, बोला क्या कभी जन्नत जाने का मन बनाया,
मैं बोला आप चलो पहले मैं आपके पीछे पीछे आया ,
दाढ़ी को खुजला के बोला तुम तक़दीर वाले, मेरा नंबर अभी नहीं आया !

उस दिन सांसे रुकी, माथे पर पसीना और मैं था घबराया,
मुझे किया तैयार और मेरे गले मौत का पट्टा पहनाया,
मुझे जन्नत जाने वाली रंग बिरंगी बस में बिठाया ,
बस को औरतो, बच्चो, बूढो से खचाखच  भरा पाया!
मेरी आँखें पत्थर और दिमाग सुन हो आया,
सोचा कौन सा पाप इनका इनसे हिसाब मांगने आया !
 
एक धमाका हुआ और मेरा चिथड़ा चिथड़ा उड़ अाया,
मैं अम्मा को आखिरी बार याद कर “माँ ” चिल्लाया ,  
सिर्फ मेरा ख़ुला मुँह ही बदनसीब माँ के हिस्से आया !

अलविदा

वो गोरा, भूरी आँखों वाला ,
लाल गालो वाला बचपन फिर लौट के नहीं आया

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १४/१२/२०१४

Bhuri aankhon wala ladka

Bachpan ka rang tha gora,
Aur galo pe thodi si lali.
Bal ghungrale uske,
Aankhen bhuri billi wali
Na tha usko koi fikr na faka,
Uski muskan  sab se nirali !

Abba la ke dete kapde late,
Amma ke hatho ka salan aur roti !
Ghar  ke peeche wali gali me khlete hum,
Main, bada bhai aur behen choti !
Main naseeb wala tha,
kitno ki kismet the apne se khoti!

Ek din ustad ji  mujhe apne pas bulaya,
kamre me baitha  kar bahut  pyar jataya,
Sunai puri duniya ki kahani aur ghento waqt bityaya,
Haath fer kar sir par  bola kya kabhi  janat jane ka man banaya,
main bola aap chalo pehle main  peeche peeche aaya,
dadhi ko khujla ke bola tum taqder wale, mera number abhi nayi aaya !

us din sanse ruki , mathe pai pasina aur main tha gabraya
mujhe kiya tyar aur mere gale mer maut ka paata pehnaya
Aur mujhe jannt jane wali rang birangi bas me bithaya
Bus ko  aurto,baccho,budo se kacha kach bhara paya
Maeri aankhen pathar aur dimag sun ho aaya,
Socha kaun sa pap inka inse hisab magne aaya

ek dhamaka hua aur mere chitdha chitdha udh aaya
main amma ko kar yad akkhir bar  “maa” chilaya
sirf mera khula hua muh badnasib maa ke hisse aaya

alvida dosto
wo gora bhuri aankhon wala,
lal galo wala bachpan laut ke nahi aaya

Tuesday, 28 October 2014

फेसबुक का पंचनामा (हास्य कविता )

फेसबुक का पंचनामा (हास्य कविता )

आज कल फेसबुक का बुखार,
लाइक, शेयर और पोस्ट करते बार बार!!

पहले रेडियो पे आती गीत बहार
फिर टीवी पर चलता चित्रहार
अब फेसबुक पे ही सारे समाचार
अब बैठ के गप्पे नहीं मारते दोस्त चार
कोई खेले अंदर, कोई कूदे बाहर
कैरम, ताश, अनंताक्षरी से नहीं रहा प्यार
अब तो कंप्यूटर स्क्रीन पर सिमट आया संसार
वो भी था, यह भी है एक खुमार
थोड़े दिनों में उतर जायेगा मेरे यार
फिर मार्किट में आएगा कोई नया तीखा आचार 

आज कल फेसबुक का बुखार...............

तुम्हारी तस्वीर को मोनालिसा बना दिया
25 लाइक्स, 5 कमेंट्स और 2 शेयर करवा दिया
कितने और किसने किया लाइक, कारोबार बना दिया 
सब को ब्यूटीफुल, प्रीटी, खूबसूरत दिखा दिया
किसी को हेमामालिनी किसी को धर्मेंदर बना दिया
ढेर सारे फैंस से उसे पसंद करवा दिया
तुम को सब ने चंने के झाड़ पे चढ़ा दिया
कितनो को इसने कवि और कितनो को शायर बना दिया
रोज लिखते ससुरे, श्यारी को सब्जी मंडी बना दिया
तुमने खुद को गुलज़ार और जावेद अख्तर का दर्जा दिलवा दिया
कॉपी और पेस्ट कर थकते नहीं, खुद को ज्ञानी बतला दिया

आज कल फेसबुक का बुखार...........................

फेसबुक ने हमारे फेस को सही में बुक बना दिया
किताब की तरह चुप, हमारे मुँह को सिलवा दिया
एक दूसरे का सुख दुःख सब यही बतला दिया 
बातचीत, नमस्ते, नमस्कार सब को भुला दिया
अपनों को दूर और दूर वालो का नज़दीक करवा दिया

आज कल फेसबुक का बुखार...............................

तुम्हारी फिल्म को तुमने खुद ही इसमें रिलीज़ करवाया
तुम्हारा कच्चा चिठा सब इसने तुमसे से खुलवाया
कहा गए, किसको मिले, क्या खाया
कब सोये, कब उठे, कब नहाया
कब पैदा हुए, कब हुई शादी सब बतलाया 
तुम्हारे जन्मदिन पर अंजानो को भी बुलाया  
बीवी का जन्मदिन याद नहीं, पर फेसबुक पर सब को सलाम भिजवाया
शादी की सालगिरह पर किंडरगार्डेन वाले दोस्त का पैगाम भी आया
घर वालो को तुम्हारी खबर नहीं, दुनिया को तुमने अपना पूरा कुंडली पढ़वाया

आज कल फेसबुक का बुखार.................................

फेसबुक का हंगामा है
सब ने इसका हाथ थामा है
यह हमारा लिखा खबरनामा है 
तुम्हारी ज़िन्दगी का पंचनामा है 

आज कल फेसबुक का बुखार
लाइक, शेयर और पोस्ट करते बार बार


आपका अपना अनुराग "परदेसी" २५/१०/२०१४

Wednesday, 24 September 2014

असमंजस

असमंजस
दिल की सुनू या दिमाग की सुनू
हमेशा असमंजस में रहता हूँ I
किसकी सुनू और किसकी न सुनू,
हमेशा उलझन में रहता हूँ I
दोनों से खून का रिश्ता,
दोनों मेरे ही गावं के,
दोनों पडोसी I
एक की सुनू तो दूसरा नाराज,
क्या करू दोनों ही हैं मेरी आवाज I
हमेशा असमंजस में रहता हूँ,
किसकी सुनू और किसकी न सुनू I
कभी दिमाग से सोचता हूँ I
कभी दिल से सोचता हूँ I
जब दिमाग से सोचता हूँ, तो हमेशा मंजिल तक पहुंचता हूँ I
जब दिल से सोचता हूँ, तो हमेशा धोखे वाली गली पहुंचता हूँ I
न जाने फिर भी दिल की ज़्यादा, दिमाग की कम सुनता हूँ I
नफे नुकसान का हिसाब नहीं, पर ज़िन्दगी जीता हूँ I
दिमाग तो ऊपर है, दिल को अपने दिल के बहुत पास रखता हूँ
हमेशा असमंजस में रहता हूँ,
किसकी सुनू और किसकी न सुनू I
दिमाग ने बहुत बार बचाया,
दिल ने हर बार लुटाया I
दिमाग देता दौलत और सरमाया,
दिल ने दया और प्यार का पाठ पढ़ाया I
दिमाग ने पैसा कमाया,
पर दिल ने सब खर्च करवाया I
हमेशा असमंजस में रहता हूँ,
किसकी सुनू और किसकी न सुनू I
दिमाग हिसाब में बहुत पक्का,
दिल को हिसाब बिलकुल समझ नहीं आया I
दिमाग कभी कभी थक कर सो जाता,
दिल ने दिन रात हंसाया और कभी कभी रुलाया I
दिमाग कभी रिश्तो को नहीं समझ पाया,
उसमे हर बार दिल ही अव्वल आया I
हमेशा असमंजस में रहता हूँ,
किसकी सुनू और किसकी न सुनू I
आपका अपना अनुराग "परदेसी" २१/०९/२०१४

Sunday, 21 September 2014

फ़रियाद

फ़रियाद
ज़िंदा रहने की आदत नहीं रही,
फिर भी दिन रात जीते,
पर अब जीने में पुराने दिनों जैसी बात नहीं आती I
तेरी खुशबू, सिर्फ तेरी थी,
बाजार में फूल बहुत पर उनकी खुशबू में तेरी खुशबू नहीं आती I
जब से हम तुम जुदा हुए तेरी याद बहुत आती,
यह आलम की तेरी यादो की भी याद आती I
लगता है अब हमारी सांसे मरने लगी,
अब सांसो में साँस नहीं आती I
प्यार तो बहुत बिकता
पर उनके प्यार में तेरे प्यार जैसी इबादत नहीं आती I
ज़िंदा लाश बने फिरते है गली कूचों में,
मौत के धुएं के दो कश लेते जब, वही दो पल जी लेते है I
मुरझा गए है, अब पानी न पिलायो
ज़हर के दो घूंट जब पीते, वही दो पल जी लेते है I
आँखों में चुबती है रौशनी, दीये न जलायो,
जब बुझते सारे दीये, वही दो पल जी लेते है I
पुराने ज़ख्म न कुरेदो, मलहम खत्म हो चुकी,
नए ज़ख़्म जब लगते, वही दो पल जी लेते है I
आंसू नहीं बहते अब आँखें पत्थर हो चुकी,
कभी जब दिल नम होता, वही दो पल जी लेते है
ज़िंदा रहने की आदत नहीं रही,
फिर भी दिन रात जीते,
पर अब जीने में पुराने दिनों जैसी बात नहीं आती
आपका अनुराग "परदेसी" २०/०९/२०१४

Friday, 19 September 2014

यादें

यादें
ज़िन्दगी के सफर में क्या क्या पीछे छूट जाता है,
कभी सोचा नहीं कौन कब कैसे क्यों छूट जाता है,
कुछ याद रहता कुछ न जाने क्यों भूल जाता I
कुछ तो याद,
कुछ तो याद के आईने के सामने नहीं आता,
कुछ लम्हे उम्र भर याद,
पर इंसान कितने साल ऐसे ही भूल जाता,
कड़वा स्वाद उम्र भर,
मीठा मुह का स्वाद छोड़ जाता I
ज़िन्दगी के सफर में क्या क्या पीछे छूट जाता है,
कभी सोचा नहीं कौन कब कैसे क्यों छूट जाता है,
कुछ याद रहता कुछ न जाने क्यों भूल जाता I
कुछ लम्हों का रहता बरसो इंतजार,
कुछ को याद करते हम बार बार,
कुछ भूलने भी भूलते नहीं,
हमेशा दिल पे करते वार,
कुछ तो दुनिया वाले भूलने नहीं देते,
कोशिश करो तुम चाहे हज़ार I
ज़िन्दगी के सफर में क्या क्या पीछे छूट जाता है,
कभी सोचा नहीं कौन कब कैसे क्यों छूट जाता है,
कुछ याद रहता कुछ न जाने क्यों भूल जाता I
कहानिया तो बहुत लिखते,
ज़्यादा अधूरी रह जाती,
चंद ही मुक्मल हो पाती,
जो मुक्मल हुई,
वो सब भी मुकाम नहीं पाती,
जो मुकाम तक पहुंची,
वही अपने को याद रह जाती I
ज़िन्दगी के सफर में क्या क्या पीछे छूट जाता है,
कभी सोचा नहीं कौन कब कैसे क्यों छूट जाता है,
कुछ याद रहता कुछ न जाने क्यों भूल जाता I
आपका अपना अनुराग "परदेसी" 14/09/2014

दिन और रात का खेल

दिन और रात का खेल
दिन उजालो का रात अंधेरो की I
दिन तुम्हारा, रात गुस्ताखों की I
दिन हजारो का रात लाखो की I
दिन मज़बूरी का रात ख्वाबो की I
सूरज, चाँद ने देखो क्या क्या रंग खिलाये I
दोनों ने अपने गोरख धंधे के कैसे जाल बिछाये I
फूल सुबह चढ़े मंदिर, रात को हसीन ग़ज़रा बन जाये I
धुप में काला चश्मा, रातो को रंगीन हो जाये I
एक बहाये पसीना, दूसरा पाप की गठरी उठाये I
दिन ईमान, रात बेईमान I
दिन भगवान, रात शैतान I
दिन इंसान, रात हैवान I
दिन बचपन, रात जवान I
गंगा जल का प्याला, रात को ज़ाम बन के छलक जाये I
सोता समुन्दर, रातो में ने जाने किसको आवाज लगाये I
दिन में किये वादे सच्चे, रात के कौन सुबह याद दिलाये I
असली नकली की परख रौशनी में,अंधेरो में सब सजधज के आये I
दिन उजालो का, रात अंधेरो की I
दिन तुम्हारा, रात गुस्ताखों की I
आपका अनुराग "परदेसी" १७/०९/२०१४

Thursday, 11 September 2014

आज की भक्ति

आज की भक्ति

साधु संतो ने जंगल पहाड़ छोड़ दिए,
और शहरों में डाल दिया डेरा I
ईशवर भी ढूंढते उनको,
कहां छोड़ के चले सब घर मेरा I

चोला, माला, कमंडल, आसन यह सब पीछे छोड़ दिया I
दुनिया की चकाचौंद के सामने, आँखों का तेज़ खो दिया I 
कीमत लगा अपने ज्ञान की, भक्ति की गंगा का रुख मोड़ दिया I 
खोखले प्रवचन, झूठे आशीर्वादों से भीड़ को अपने से जोड लिया I
श्रद्धा के झूठे सागर का करके मंथन, विष घोट के पिला दिया I
खुद तो रास्ता भटक गए, अपने साथ संसार को भी भटका दिया I

साधु संतो ने जंगल पहाड़ छोड़ दिए,
और शहरों में डाल दिया डेरा I
ईशवर भी ढूंढते उनको,
कहां छोड़ के चले सब घर मेरा I

झिलमिलाती नगरी में देखो भक्तो का अब लगता है ताँता I
चारो और भक्ति का शोर, नहीं रहा प्रभु से कोई नाता I
तेज़ रफ्तारी में हर कोई मंदिर के द्वार होकर आता जाता I
काले धन की भेंट भी चढ़ती, सब कुछ तेरी तिजोरी में समाता I
भगवन का किया इतना श्रृंगार, वो भी अपने को नहीं पहचानता I
श्रद्धा सस्ती महंगी, अब भक्त अपनी भक्ति का वजन उसी से नापता I

साधु संतो ने जंगल पहाड़ छोड़ दिए,
और शहरों में डाल दिया डेरा I
ईशवर भी ढूंढते उनको,
कहां छोड़ के चले सब घर मेरा I

आपका अपना अनुराग "परदेसी" ०५/०९/२०१४

Sunday, 7 September 2014

दरिंदे और ज़िंदा मुर्दे

Trigger for this one :
In various parts of the world evil forces are ruling the roost, governments are powerless and people are speechless. Only God knows what the endgame is ???
दरिंदे और ज़िंदा मुर्दे
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी रोती और मौत हँसती I
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी महंगी और मौत सस्ती I
दरिंदे ज़िंदा,
मुर्दे कब के सो चुके I
दरिंदे आग बरसते,
मुर्दो के हाथ ठंडे हो चुके I
दरिंदो की हकूमत,
मुर्दे पहले तख़्त खाली कर चुके I
दरिंदो का रंग अंदर से काला,
मुर्दे तो कब के सफ़ेद हो चुके I
दरिंदे हँसते,
मुर्दो के मुँह कब के सिल चुके I
दरिंदे बेचते कफ़न,
मुर्दे तो कब के दफ़न हो चुके I
दरिंदे जीते मौत के साये में,
मुर्दे मौत के साये में जी चुके I
.
यहाँ डर के नाख़ून लम्बे,
हिम्मत बर्फ हो चुकी I
यहाँ हादसों की फेहरिस्त लम्बी,
खुशियो की फेहरिस्त छोटी हो चुकी I
यहाँ हैवानियत का दरख़्त ऊँचा,
इंसानियत की बेल सुख चुकी I
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी रोती और मौत हँसती I
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी महंगी और मौत सस्ती I
आपका अपना अनुराग "परदेसी" ०२/०९/१४

Monday, 21 July 2014

सियासत

सियासत 
आजकल रियासत में सिर्फ सियासत है 
बिसात बिछी है, सबको शतरंज की आदत है 
मोहरे चलते है, सब को सब करने की इजाजत है 
संभलो, अब तुमको सिर्फ तुम्हारी ही हिफाज़त है 
दिन गिनते रहो, जब तक सब सलामत है 
शहर के माथे पर शिकन, अब यही हालत है 

आजकल रियासत में सिर्फ सियासत है 
बिसात बिछी है, सबको शतरंज की आदत है 

अपनों की मीठी, परायो की कड़वी सियासत
दोस्तों की छिपी, दुश्मनों की नंगी सियासत
मंदिर और मस्जिद की बरसो पुरानी सियासत
झूठ और सच की, प्यार के कारोबार की सियासत
कहा मिलती राहत, चारो तरफ सियासत
दुनिया है जंगे मैदान सियासत

आजकल रियासत में सिर्फ सियासत है
बिसात बिछी है, सबको शतरंज की आदत है

चारो तरफ जगमग, पर दिलो में खौफ का अँधेरा
चारो तरफ दौलत, पर हर कोई बना फिरता फकीरा
चारो तरफ मीठी जुबान, पर हर कोई दिखता लूटेरा
चारो तरफ शोर, घरो के अंदर सनाटे का बसेरा
चारो तरफ दौड़, नहीं दिखता धीमा धीमा सा सवेरा
चारो तरफ अपने, पर लगता नहीं मुझे कोई मेरा

आजकल रियासत में सिर्फ सियासत है
बिसात बिछी है, सबको शतरंज की आदत है

आप अपना अनुराग "परदेसी" १८/०७/२०१४

रियासत means state/country
सियासत- politics
हिफाज़त- protection

Sunday, 20 July 2014

निराली दुनिया , माँ की बाते , अमन का गीत, घड़ी का घुमान, बंद मुठ्ठी, आज़ाद हो तुम - My last six poems which i had not posted since Jun'2014

निराली दुनिया

बड़ी अजीब बड़ी निराली है तेरी दुनिया,
कही सूखी कही हरयाली है यह दुनिया,
समझ कर भी नहीं समझ पाये दुनिया I

वो चल चल के थक जाते है,
हम थकने के लिए चलने जाते है I      
उनके पेट खाली, एक सूखी रोटी को तरस जाते है,
जिनके पेट भरे, वो अपने डिब्बे भी रोटी से भरे पाते है I
वो पैसा कमाने के लिए दिन रात पसीना बहाते है,
हम बहाने के लिए दुकान में पैसा दे कर आते है I

बड़ी अजीब बड़ी निराली है तेरी दुनिया,
कही सूखी कही हरयाली है यह दुनिया,
समझ कर भी नहीं समझ पाये दुनिया I

बड़े परिवार वाले छोटे छोटे घरो में घुट के रह जाते है,
महलो वाले सब अकेले, कहाँ उन में सांस ले पाते है I
वो हर रोज कमाई का हिसाब लगाते है,
कुछ को हिसाब नहीं वो कितना कमाते है I
वो हर सुबह नहाने के लिए नदी में गोता लगा के आते है,
उनको नींद नहीं आती वो सोने के लिए शराब में नहाते है I

बड़ी अजीब बड़ी निराली है तेरी दुनिया,
कही सूखी कही हरयाली है यह दुनिया,
समझ कर भी नहीं समझ पाये दुनिया I

आज कल पंख कटा कर मोर ऊँचे पेड़ो पर बैठे नज़र आते है,
काले कौए अपने पंखो को रंग कर बरसात में झूमते मंडराते है I
बबूल का पेड आँगन में और तुलसी को घर के बाहर लगाते है,
अब चारो तरफ बनाटवी चहेरे, बनाटवी फूलो से मुस्कुराते है I 
कही भी चले जाये, सब अपने को एक दूसरे से दूर पाते है,
क्यों की सब अपने  में वयसत नज़र आते है I

बड़ी अजीब बड़ी निराली है तेरी दुनिया,
कही सूखी कही हरयाली है यह दुनिया,
समझ कर भी नहीं समझ पाये दुनिया I

आपका अपना अनुराग " परदेसी" २८/६/१४



माँ की बाते 

सारी बाते भूल गया बचपन की, सिर्फ माँ तेरी बाते याद है
कितनी बुरी कितनी कड़वी, बेतुकी लगती थी तब तेरी बाते, याद है
हम थे नए ज़माने के, तू थी पुराने ज़माने की, याद है
दोस्तों को भी बतलाने से शरमाते थे बाते तुम्हारी, याद है
तुम्हारा दिल रखने के लिए कभी सुन लिया करते थे, याद है
तू भी नहीं समझती थी, ज़िद पे अड़ी रहती थी, सब याद है
हम तो बहुत पढ़ लिख गए, तू दूर गॉव की थी, याद है
सारी बाते भूल गया बचपन की, सिर्फ माँ तेरी बाते याद है

हर रोज तेरे नुस्खे, तेरी नसीहत, तू मुझे याद कराया कर 
शरीर तगड़ा और तंदरुस्त रहता है दूध दही खाया कर 
दिमाग ठंडा रहता है सर में हर रोज तेल लगाया कर  
बुरी संगत से दूर अच्छो के साथ दिन बिताया कर 
बीमारी में दवाई वक़्त पर खाया कर
ज़माना ख़राब है श्याम को जल्दी घर आ जाया कर
कभी मेरे साथ पास वाले मंदिर हो आया कर
पिता जी से बात नहीं करता, कभी उनको भी कुछ बतलाया कर
हर रोज तेरे नुस्खे, तेरी नसीहत, तू मुझे याद कराया कर 

माँ अब तेरी सारी बाते मानता हूँ, उनको जीवन का सार मानता हूँ
सुबह दूध दोपहर में दही खा के, अपना दिन गुजारता हूँ
बिना सर में तेल मालिश के नींद नहीं आती, अब तेरा कहा मानता हूँ
अब हर रोज अपनी दवाई वक़्त से गले से उतारता हूँ  
संगत अच्छी है उन के साथ थोड़ा खाली वक़्त निकालता हूँ
घर से बाहर कम निकलता, फूलो, किताबो के साथ ज़िन्दगी गुजारता हूँ
शहर में एक ही मंदिर है, उसमे कभी कभी उसका नाम जापता हूँ
तुम्हारी बात याद है, पिता जी से कभी कभी फ़ोन पे अपना दिल बांटता हूँ
माँ अब तेरी सारी बाते मानता हूँ, उनको जीवन का सार मानता हूँ

आपका अपना अनुराग "परदेसी" ०६/०७/२०१४




अमन का गीत

तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा
तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा
हम दोनों का रंग है एक दूसरे जैसा
हम दोनों का रंग है एक दूसरे जैसा

फिर आँखो में एक दूसरे के लिए लहू कैसा
फिर मैं तेरे खून का, तू मेरे खून का प्यासा कैसा
क्या कभी सोचा हम दोनों का रिश्ता क्यों है ऐसा
हमारा रिश्ता क्यों नहीं रहा अब पुराना जैसा 

तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा
तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा

मैं जो पानी पीता, तू वही पानी पीता वैसा  
हम सब का मालिक का है एक जैसा
हमारे बच्चो को देखो, उनका मुस्कान है एक जैसा
क्यों हम अब एक दूसरे के लिए नहीं जीते पहले जैसा

तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा
तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा

आ आज हम दोनों आपस में बैठ कर विचार एक जैसा
मजहब के ठेकदारों को अपने बीच से बाहर करे ऐसा
ताकि फिर दोबारा ऊपर वाले के नाम का व्योपार न करे वो ऐसा  
उलजे हुए, ऊपर वाले से अपने तारो को, सीधा करे हम ऐसा  

तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा
तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १०/०७/१४


घड़ी का घुमान  

कभी किसी की दीवार पर कभी किसी की कलाई पर सजती हूँ
दिल छोटा है फिर भी बिना रुके दोनों हाथो से दिन रात चलती हूँ
कभी सीधी साधी और कभी तो कीमती हीरों और मोतियों से जड़ती हूँ 
थोड़ी खुशफहमी में रहती हूँ, शायद मैं ही दिन और रात करती हूँ
मुझे कठपुतली मत समझना, मैं तो सब को कठपुतली बना के रखती हूँ
दुनिया की परवाह नहीं, मैं तो अपनी मर्जी से अपना मधुर नर्तय करती हूँ 
 
मैं न तेज न धीमी, हमेशा एक रफ़्तार से ही चलती हूँ
लोग न जाने क्यों कहते उनकी ख़ुशी में बिना साँस लिए दौड़ती हूँ
कुछ कहते है उनके ग़म में बहुत धीमी धीमी सी चलती हूँ
सुनती सब के मन की, पर अपने मन की ही करती हूँ
अमीर गरीब किसी की पकड़ में नहीं, अपनी मस्ती में ही चलती हूँ
वक़्त की माँ हूँ मैं, उसको अपनी बाहों में समेटे रखती हूँ

एक दिन रात को न जाने क्यों थोड़ी धीमी और बीमार हो गयी
अँधेरी घनी रात में, मैं बहुत परेशान और लाचार हो गयी
अब दिन रात नहीं होगे, सोचते सोचते न जाने कब आँखें नींद से चार हो गयी
आँख खुली तो देखा सुबह और फिर शाम भी इस बार हो गयी
मालूम पड़ा वक़्त मेरी मुठी में नहीं, मैं ही वक़्त की मुठी में गिरफ्तार हो गयी
अपनी ताक़त और असलियत सब आईने जैसी सामने आर पार हो गयी

हम सब इस दुनिया की दीवार पर एक घड़ी की तरह है, जान लो
सब घड़ियों की चाबी भगवान ने भरी है, यह तुम सब मान लो
ज़्यादा ऊँची बाज़ी मत खेलो, सब अपनी अपनी सच्चाई पहचान लो
हम सब इस दुनिया की दीवार पर एक घड़ी की तरह है, जान लो

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १३/०७/१४


बंद मुठ्ठी    

हाथ की मुठ्ठी तो हर बार बहुत कस के बंद की,
पर कभी कुछ उसमे पकड़ न पाया I
कई बार अहसास हुआ शायद कुछ हाथ में है,
पर वो तो एक शलावा था, सब मुठ्ठी से बाहर निकल आया I
किस्मत की खींची लकीरो को पढ़ते रहे, सपने बुनते रहे,
पर अंत में मुठ्ठी में सिर्फ हाथ की लकीरो का जाल ही समाया I
बहुत देर से बंद कर के रखी थी हमने,
फिर भी खाली रही, पर हाथ गिला हो आया I

सोने के जेवर बनवाए I
चांदी की थाली में खाना खाए I
रेशमी कपडे सिलवाए I 
महलो जैसे घर बनवाए I 

सोना, चांदी, महल यह सब रेत का ढ़ेर I 
नहीं टिकती रेत मुठ्ठी में फिसल जाती देर सवेर I
कहा समझ पाया कोई, अब तक ज़िंदगी का खेल I
नया आगे, पुराना पीछे ऐसे ही चलती दुनिया की रेल I

अभी जागी थी, मैं अभी सो गयी I
अभी खुली थी मुठ्ठी, अब बंद हो गयी I
अभी सुबह थी, अब रात अँधेरी हो गयी I
अभी मुठ्ठी भरी थी, देखते ही खाली हो गयी I

आपका अपना अनुराग " परदेसी" १५/०७/14




आज़ाद हो तुम 

तुम्हारी सोच, तुम्हारे सपनो का कोई ठोर नहीं 
लाख करे कोशिश, उनपर किसी का जोर नहीं 

खुली वादियाँ, खुला आसमाँ उनका कोई छोर नहीं 
चंचल शोख हवाओं का बिलकुल शोर नहीं 
छल छल बहते पानी जैसा, कुछ और नहीं 
बांसुरी के मधुर संगीत सा सुरूर नहीं 
रंग बिरंगे फूलो जैसा, कोई हुज़ूर नहीं 
सब दौलत तुम्हारी, चुरा सकता चोर नहीं 
पंख फैलाओ अपने, पिंजरे में क़ैद मोर नहीं 
भर लो दिल में उमंग, चाहे अभी भौर नहीं  

आज़ाद हो तुम, आज़ाद हो तुम

खुद अपनी पहचान बनो इंसान हो तुम 
मुश्किल नहीं, खुद का अरमान हो तुम
अपनी हिम्मत का रेगिस्तान हो तुम
हार मत मानना चाहे लहूलुहान हो तुम
बहते पानी में ख़ामोशी का तूफ़ान हो तुम 
तुम्हे कहा खबर सात सुरों की तान हो तुम 
खुशबू बिखेरते हो, महफ़िल की जान हो तुम 
खुली हवाओं में बेफिक्र परवान हो तुम 

तुम्हारी सोच, तुम्हारे सपनो का कोई ठोर नहीं 
लाख करे कोशिश, उनपर किसी का जोर नहीं 

आज़ाद हो तुम, आज़ाद हो तुम

आप अपना अनुराग "परदेसी" १८/०७/२०१४



Saturday, 14 June 2014

रिश्तो की अलमारी

रिश्तो की अलमारी
आज हमने बरसो के बाद अपनी रिश्तो की अलमारी खोली,
देखा तो बहुत धूल जम आई थी सब रिश्तो की किताबो पर I

कुछ नयी, कुछ पुरानी,
कुछ रोती, कुछ हँसती,
कुछ घूरती, कुछ सहमी,
कुछ सस्ती, कुछ महंगी,
कुछ सोती, कुछ जागती,
सब किताबे बेतरतीब पड़ी थी I

कुछ अहम की दीमक के कीड़े खा गये, कुछ पर शक़ और परायेपन के जाले लग आये थे I
कुछ बिलकुल ठीक थी, सिर्फ एक दो पन्ने हमारी गलती से मुड़ आये थे I
दूर कोने में जो पड़ी थी, उन पर लिखे अल्फाज मिट आये थे I
ऊपर की कतार में जो नज़दीक थी, नयी थी सिर्फ, उनके ऊपर के पेज फट आये थे I
कुछ पन्नें खुलने का इंतजार करते करते, पड़े पड़े पुराने हो आये थे I
पुरानी को पढ़ना भूल गए थे, हर महीने नयी किताबे खरीद लाये थे I
दुनिया को रिझाने के लिए, कुछ नापसंद किताबे भी खरीद के ले आये थे I
कुछ मनपसंद किताबे, चंद सिक्को की खातिर बाजार में भी बेच आये थे I

आज हमने बरसो के बाद अपनी रिश्तो की अलमारी खोली,
देखा तो बहुत धूल जम आई थी सब रिश्तो की किताबो पर I

पुरानी किताबे है, कुछ को थाम हाथ खुशक, कुछ को पढ़ के आँख नम हो आये I
थोड़ी सी प्यार की धुप लगाने से, किताबो के सारे पन्ने नए हो आये I
बरसो पुरानी पड़ी किताबो के पन्ने, हमारे छूने भर के अहसास से खिल आये I
देर से ही सही, इस बार हम तो अपनी अलमारी खोल के साफ कर आये I 
ज़िन्दगी की लाइब्रेरी में, सब किताबो को उनकी जगह सजा आये
नयी पुरानी सब को खोल के, अपनों के प्यार की हवा लगवा लायेI
अब किताब के दाम से उसकी कीमत नहीं आंकते, जैसा हम बरसो से करते आये I
अब तो आँखों के सामने खोल के रखी, ताकि गलती से फिर धूल जम जाये I
अब किताबे पढ़ते लिखते रहते है, ताकि ज़िन्दगी मुस्कुराती रहे और दोबारा न रूठ जाये I

आज हमने बरसो के बाद अपनी रिश्तो की अलमारी खोली,
देखा तो बहुत धूल जम आई थी सब रिश्तो की किताबो पर I

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १३/०६/२०१४