Sunday, 7 September 2014

दरिंदे और ज़िंदा मुर्दे

Trigger for this one :
In various parts of the world evil forces are ruling the roost, governments are powerless and people are speechless. Only God knows what the endgame is ???
दरिंदे और ज़िंदा मुर्दे
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी रोती और मौत हँसती I
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी महंगी और मौत सस्ती I
दरिंदे ज़िंदा,
मुर्दे कब के सो चुके I
दरिंदे आग बरसते,
मुर्दो के हाथ ठंडे हो चुके I
दरिंदो की हकूमत,
मुर्दे पहले तख़्त खाली कर चुके I
दरिंदो का रंग अंदर से काला,
मुर्दे तो कब के सफ़ेद हो चुके I
दरिंदे हँसते,
मुर्दो के मुँह कब के सिल चुके I
दरिंदे बेचते कफ़न,
मुर्दे तो कब के दफ़न हो चुके I
दरिंदे जीते मौत के साये में,
मुर्दे मौत के साये में जी चुके I
.
यहाँ डर के नाख़ून लम्बे,
हिम्मत बर्फ हो चुकी I
यहाँ हादसों की फेहरिस्त लम्बी,
खुशियो की फेहरिस्त छोटी हो चुकी I
यहाँ हैवानियत का दरख़्त ऊँचा,
इंसानियत की बेल सुख चुकी I
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी रोती और मौत हँसती I
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी महंगी और मौत सस्ती I
आपका अपना अनुराग "परदेसी" ०२/०९/१४

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