Friday, 19 September 2014

दिन और रात का खेल

दिन और रात का खेल
दिन उजालो का रात अंधेरो की I
दिन तुम्हारा, रात गुस्ताखों की I
दिन हजारो का रात लाखो की I
दिन मज़बूरी का रात ख्वाबो की I
सूरज, चाँद ने देखो क्या क्या रंग खिलाये I
दोनों ने अपने गोरख धंधे के कैसे जाल बिछाये I
फूल सुबह चढ़े मंदिर, रात को हसीन ग़ज़रा बन जाये I
धुप में काला चश्मा, रातो को रंगीन हो जाये I
एक बहाये पसीना, दूसरा पाप की गठरी उठाये I
दिन ईमान, रात बेईमान I
दिन भगवान, रात शैतान I
दिन इंसान, रात हैवान I
दिन बचपन, रात जवान I
गंगा जल का प्याला, रात को ज़ाम बन के छलक जाये I
सोता समुन्दर, रातो में ने जाने किसको आवाज लगाये I
दिन में किये वादे सच्चे, रात के कौन सुबह याद दिलाये I
असली नकली की परख रौशनी में,अंधेरो में सब सजधज के आये I
दिन उजालो का, रात अंधेरो की I
दिन तुम्हारा, रात गुस्ताखों की I
आपका अनुराग "परदेसी" १७/०९/२०१४

No comments:

Post a Comment