Thursday, 11 September 2014

आज की भक्ति

आज की भक्ति

साधु संतो ने जंगल पहाड़ छोड़ दिए,
और शहरों में डाल दिया डेरा I
ईशवर भी ढूंढते उनको,
कहां छोड़ के चले सब घर मेरा I

चोला, माला, कमंडल, आसन यह सब पीछे छोड़ दिया I
दुनिया की चकाचौंद के सामने, आँखों का तेज़ खो दिया I 
कीमत लगा अपने ज्ञान की, भक्ति की गंगा का रुख मोड़ दिया I 
खोखले प्रवचन, झूठे आशीर्वादों से भीड़ को अपने से जोड लिया I
श्रद्धा के झूठे सागर का करके मंथन, विष घोट के पिला दिया I
खुद तो रास्ता भटक गए, अपने साथ संसार को भी भटका दिया I

साधु संतो ने जंगल पहाड़ छोड़ दिए,
और शहरों में डाल दिया डेरा I
ईशवर भी ढूंढते उनको,
कहां छोड़ के चले सब घर मेरा I

झिलमिलाती नगरी में देखो भक्तो का अब लगता है ताँता I
चारो और भक्ति का शोर, नहीं रहा प्रभु से कोई नाता I
तेज़ रफ्तारी में हर कोई मंदिर के द्वार होकर आता जाता I
काले धन की भेंट भी चढ़ती, सब कुछ तेरी तिजोरी में समाता I
भगवन का किया इतना श्रृंगार, वो भी अपने को नहीं पहचानता I
श्रद्धा सस्ती महंगी, अब भक्त अपनी भक्ति का वजन उसी से नापता I

साधु संतो ने जंगल पहाड़ छोड़ दिए,
और शहरों में डाल दिया डेरा I
ईशवर भी ढूंढते उनको,
कहां छोड़ के चले सब घर मेरा I

आपका अपना अनुराग "परदेसी" ०५/०९/२०१४

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