Sunday, 20 July 2014

निराली दुनिया , माँ की बाते , अमन का गीत, घड़ी का घुमान, बंद मुठ्ठी, आज़ाद हो तुम - My last six poems which i had not posted since Jun'2014

निराली दुनिया

बड़ी अजीब बड़ी निराली है तेरी दुनिया,
कही सूखी कही हरयाली है यह दुनिया,
समझ कर भी नहीं समझ पाये दुनिया I

वो चल चल के थक जाते है,
हम थकने के लिए चलने जाते है I      
उनके पेट खाली, एक सूखी रोटी को तरस जाते है,
जिनके पेट भरे, वो अपने डिब्बे भी रोटी से भरे पाते है I
वो पैसा कमाने के लिए दिन रात पसीना बहाते है,
हम बहाने के लिए दुकान में पैसा दे कर आते है I

बड़ी अजीब बड़ी निराली है तेरी दुनिया,
कही सूखी कही हरयाली है यह दुनिया,
समझ कर भी नहीं समझ पाये दुनिया I

बड़े परिवार वाले छोटे छोटे घरो में घुट के रह जाते है,
महलो वाले सब अकेले, कहाँ उन में सांस ले पाते है I
वो हर रोज कमाई का हिसाब लगाते है,
कुछ को हिसाब नहीं वो कितना कमाते है I
वो हर सुबह नहाने के लिए नदी में गोता लगा के आते है,
उनको नींद नहीं आती वो सोने के लिए शराब में नहाते है I

बड़ी अजीब बड़ी निराली है तेरी दुनिया,
कही सूखी कही हरयाली है यह दुनिया,
समझ कर भी नहीं समझ पाये दुनिया I

आज कल पंख कटा कर मोर ऊँचे पेड़ो पर बैठे नज़र आते है,
काले कौए अपने पंखो को रंग कर बरसात में झूमते मंडराते है I
बबूल का पेड आँगन में और तुलसी को घर के बाहर लगाते है,
अब चारो तरफ बनाटवी चहेरे, बनाटवी फूलो से मुस्कुराते है I 
कही भी चले जाये, सब अपने को एक दूसरे से दूर पाते है,
क्यों की सब अपने  में वयसत नज़र आते है I

बड़ी अजीब बड़ी निराली है तेरी दुनिया,
कही सूखी कही हरयाली है यह दुनिया,
समझ कर भी नहीं समझ पाये दुनिया I

आपका अपना अनुराग " परदेसी" २८/६/१४



माँ की बाते 

सारी बाते भूल गया बचपन की, सिर्फ माँ तेरी बाते याद है
कितनी बुरी कितनी कड़वी, बेतुकी लगती थी तब तेरी बाते, याद है
हम थे नए ज़माने के, तू थी पुराने ज़माने की, याद है
दोस्तों को भी बतलाने से शरमाते थे बाते तुम्हारी, याद है
तुम्हारा दिल रखने के लिए कभी सुन लिया करते थे, याद है
तू भी नहीं समझती थी, ज़िद पे अड़ी रहती थी, सब याद है
हम तो बहुत पढ़ लिख गए, तू दूर गॉव की थी, याद है
सारी बाते भूल गया बचपन की, सिर्फ माँ तेरी बाते याद है

हर रोज तेरे नुस्खे, तेरी नसीहत, तू मुझे याद कराया कर 
शरीर तगड़ा और तंदरुस्त रहता है दूध दही खाया कर 
दिमाग ठंडा रहता है सर में हर रोज तेल लगाया कर  
बुरी संगत से दूर अच्छो के साथ दिन बिताया कर 
बीमारी में दवाई वक़्त पर खाया कर
ज़माना ख़राब है श्याम को जल्दी घर आ जाया कर
कभी मेरे साथ पास वाले मंदिर हो आया कर
पिता जी से बात नहीं करता, कभी उनको भी कुछ बतलाया कर
हर रोज तेरे नुस्खे, तेरी नसीहत, तू मुझे याद कराया कर 

माँ अब तेरी सारी बाते मानता हूँ, उनको जीवन का सार मानता हूँ
सुबह दूध दोपहर में दही खा के, अपना दिन गुजारता हूँ
बिना सर में तेल मालिश के नींद नहीं आती, अब तेरा कहा मानता हूँ
अब हर रोज अपनी दवाई वक़्त से गले से उतारता हूँ  
संगत अच्छी है उन के साथ थोड़ा खाली वक़्त निकालता हूँ
घर से बाहर कम निकलता, फूलो, किताबो के साथ ज़िन्दगी गुजारता हूँ
शहर में एक ही मंदिर है, उसमे कभी कभी उसका नाम जापता हूँ
तुम्हारी बात याद है, पिता जी से कभी कभी फ़ोन पे अपना दिल बांटता हूँ
माँ अब तेरी सारी बाते मानता हूँ, उनको जीवन का सार मानता हूँ

आपका अपना अनुराग "परदेसी" ०६/०७/२०१४




अमन का गीत

तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा
तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा
हम दोनों का रंग है एक दूसरे जैसा
हम दोनों का रंग है एक दूसरे जैसा

फिर आँखो में एक दूसरे के लिए लहू कैसा
फिर मैं तेरे खून का, तू मेरे खून का प्यासा कैसा
क्या कभी सोचा हम दोनों का रिश्ता क्यों है ऐसा
हमारा रिश्ता क्यों नहीं रहा अब पुराना जैसा 

तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा
तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा

मैं जो पानी पीता, तू वही पानी पीता वैसा  
हम सब का मालिक का है एक जैसा
हमारे बच्चो को देखो, उनका मुस्कान है एक जैसा
क्यों हम अब एक दूसरे के लिए नहीं जीते पहले जैसा

तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा
तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा

आ आज हम दोनों आपस में बैठ कर विचार एक जैसा
मजहब के ठेकदारों को अपने बीच से बाहर करे ऐसा
ताकि फिर दोबारा ऊपर वाले के नाम का व्योपार न करे वो ऐसा  
उलजे हुए, ऊपर वाले से अपने तारो को, सीधा करे हम ऐसा  

तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा
तेरा रंग है मेरे जैसा, मेरा रंग है तेरे जैसा

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १०/०७/१४


घड़ी का घुमान  

कभी किसी की दीवार पर कभी किसी की कलाई पर सजती हूँ
दिल छोटा है फिर भी बिना रुके दोनों हाथो से दिन रात चलती हूँ
कभी सीधी साधी और कभी तो कीमती हीरों और मोतियों से जड़ती हूँ 
थोड़ी खुशफहमी में रहती हूँ, शायद मैं ही दिन और रात करती हूँ
मुझे कठपुतली मत समझना, मैं तो सब को कठपुतली बना के रखती हूँ
दुनिया की परवाह नहीं, मैं तो अपनी मर्जी से अपना मधुर नर्तय करती हूँ 
 
मैं न तेज न धीमी, हमेशा एक रफ़्तार से ही चलती हूँ
लोग न जाने क्यों कहते उनकी ख़ुशी में बिना साँस लिए दौड़ती हूँ
कुछ कहते है उनके ग़म में बहुत धीमी धीमी सी चलती हूँ
सुनती सब के मन की, पर अपने मन की ही करती हूँ
अमीर गरीब किसी की पकड़ में नहीं, अपनी मस्ती में ही चलती हूँ
वक़्त की माँ हूँ मैं, उसको अपनी बाहों में समेटे रखती हूँ

एक दिन रात को न जाने क्यों थोड़ी धीमी और बीमार हो गयी
अँधेरी घनी रात में, मैं बहुत परेशान और लाचार हो गयी
अब दिन रात नहीं होगे, सोचते सोचते न जाने कब आँखें नींद से चार हो गयी
आँख खुली तो देखा सुबह और फिर शाम भी इस बार हो गयी
मालूम पड़ा वक़्त मेरी मुठी में नहीं, मैं ही वक़्त की मुठी में गिरफ्तार हो गयी
अपनी ताक़त और असलियत सब आईने जैसी सामने आर पार हो गयी

हम सब इस दुनिया की दीवार पर एक घड़ी की तरह है, जान लो
सब घड़ियों की चाबी भगवान ने भरी है, यह तुम सब मान लो
ज़्यादा ऊँची बाज़ी मत खेलो, सब अपनी अपनी सच्चाई पहचान लो
हम सब इस दुनिया की दीवार पर एक घड़ी की तरह है, जान लो

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १३/०७/१४


बंद मुठ्ठी    

हाथ की मुठ्ठी तो हर बार बहुत कस के बंद की,
पर कभी कुछ उसमे पकड़ न पाया I
कई बार अहसास हुआ शायद कुछ हाथ में है,
पर वो तो एक शलावा था, सब मुठ्ठी से बाहर निकल आया I
किस्मत की खींची लकीरो को पढ़ते रहे, सपने बुनते रहे,
पर अंत में मुठ्ठी में सिर्फ हाथ की लकीरो का जाल ही समाया I
बहुत देर से बंद कर के रखी थी हमने,
फिर भी खाली रही, पर हाथ गिला हो आया I

सोने के जेवर बनवाए I
चांदी की थाली में खाना खाए I
रेशमी कपडे सिलवाए I 
महलो जैसे घर बनवाए I 

सोना, चांदी, महल यह सब रेत का ढ़ेर I 
नहीं टिकती रेत मुठ्ठी में फिसल जाती देर सवेर I
कहा समझ पाया कोई, अब तक ज़िंदगी का खेल I
नया आगे, पुराना पीछे ऐसे ही चलती दुनिया की रेल I

अभी जागी थी, मैं अभी सो गयी I
अभी खुली थी मुठ्ठी, अब बंद हो गयी I
अभी सुबह थी, अब रात अँधेरी हो गयी I
अभी मुठ्ठी भरी थी, देखते ही खाली हो गयी I

आपका अपना अनुराग " परदेसी" १५/०७/14




आज़ाद हो तुम 

तुम्हारी सोच, तुम्हारे सपनो का कोई ठोर नहीं 
लाख करे कोशिश, उनपर किसी का जोर नहीं 

खुली वादियाँ, खुला आसमाँ उनका कोई छोर नहीं 
चंचल शोख हवाओं का बिलकुल शोर नहीं 
छल छल बहते पानी जैसा, कुछ और नहीं 
बांसुरी के मधुर संगीत सा सुरूर नहीं 
रंग बिरंगे फूलो जैसा, कोई हुज़ूर नहीं 
सब दौलत तुम्हारी, चुरा सकता चोर नहीं 
पंख फैलाओ अपने, पिंजरे में क़ैद मोर नहीं 
भर लो दिल में उमंग, चाहे अभी भौर नहीं  

आज़ाद हो तुम, आज़ाद हो तुम

खुद अपनी पहचान बनो इंसान हो तुम 
मुश्किल नहीं, खुद का अरमान हो तुम
अपनी हिम्मत का रेगिस्तान हो तुम
हार मत मानना चाहे लहूलुहान हो तुम
बहते पानी में ख़ामोशी का तूफ़ान हो तुम 
तुम्हे कहा खबर सात सुरों की तान हो तुम 
खुशबू बिखेरते हो, महफ़िल की जान हो तुम 
खुली हवाओं में बेफिक्र परवान हो तुम 

तुम्हारी सोच, तुम्हारे सपनो का कोई ठोर नहीं 
लाख करे कोशिश, उनपर किसी का जोर नहीं 

आज़ाद हो तुम, आज़ाद हो तुम

आप अपना अनुराग "परदेसी" १८/०७/२०१४



No comments:

Post a Comment