Wednesday, 23 April 2014

सहेली

सहेली
मेरी प्यारी माँ बनी मेरी सब से पहली और गहरी सहेली 
मैं घर में पैदा हुई बिना बहन, बिना भाई, मैं हूँ अकेली

मैं जब कुछ समझती नहीं वो समझती थी मेरी हर पहेली
मैं थी उसकी चंपा और वो थी मेरी चमेली
इतना सुन्दर है मेरा रिश्ता मेरी माँ बन गयी मेरी सहेली
अब मैं कहा रही अकेली मेरी प्यारी माँ है मेरी सहेली

मैं छोटी थी पर माँ कहती थी बहुत अलबेली
हमेशा मैं मस्त रहती,करती थी थोड़ी अठखेली
कभी थकती नहीं थी,सालो साल घंटो मेरे साथ वो खेली
साये सी रहती हमेशा हम दोनों की एक ही थी हवेली

मेरी प्यारी माँ बनी मेरी सब से पहली और गहरी सहेली 
मैं घर में पैदा हुई बिना बहन बिना भाई, मैं हूँ अकेली

नाजो से पाला उसने मुझे, वो मेरे लिए जाने क्या क्या झेली
माँ से लम्बी हो गयी गुड़िया, फिर भी रखती वो उसको अपनी हथेली
मैं हूँ मस्त पवन, एक दिन उड़ जाऊँगी बन के दुल्हन नयी नवेली
पहन लती हूँ उसकी बयाह की साडी,सच मैं बन गयी उसकी सहेली

मेरी प्यारी माँ बनी मेरी सब से पहली और गहरी सहेली 
मैं घर में पैदा हुई बिना बहन बिना भाई, मैं हूँ अकेली

मेरा संसार बस गया, मेरे घर पैदा हुई मेरी नयी सहेली
याद आती है बहुत मुझे मेरी सहेली, जिसे में छोड़ आई अकेली
जाते जाते मुझे सब सौंप गयी, दे गयी मुझे वो अपनी पुरानी थैली
दुःख दर्द, हंसी ख़ुशी सब में साथ रही थी मेरी माँ मेरी सहेली

मेरी प्यारी माँ बनी मेरी सब से पहली और गहरी सहेली 
मैं घर में पैदा हुई बिना बहन बिना भाई, मैं हूँ अकेली
आपका अपना अनुराग २१/४/२०१४ "PARDESI"




Monday, 21 April 2014

मैं नया, मैं पुराना

मैं नया, मैं पुराना
जब अपने पुराने शहर से निकला, तो बिलकुल नया था मैं,
नए शहर पहुंचते पहुंचते मैं पुराना हो गया

सफ़ेद कुर्ता पहने और साफ़ दिल के साथ निकल आया था
कुर्ता भी मैला कुचैला और दिल भी अब काला हो आया था
दोस्तों के साथ हँसते हँसते घर  से निकल आया था
अब दोस्तों के साथ अपनी हंसी भी गँवा आया था

जब अपने पुराने शहर से निकला, तो बिलकुल नया था मैं,
नए शहर पहुंचते पहुंचते मैं पुराना हो गया

खाली जेब मैं खाली हाथ डाल के निकल आया था
जेब थोड़ी भरी पर हाथ बंद मुठी बन आया था
झोली मैं बड़ो की दुया और  आशीर्वाद ले आया था
झोली खाली, पर दुनिया के लिए तक़दीर वाला कहलाया था

जब अपने पुराने शहर से निकला, तो बिलकुल नया था मैं,
नए शहर पहुंचते पहुंचते मैं पुराना हो गया

छोटे कमरे से  खुला खुला निकल कर उड़ आया था
अब अपने को बड़े घर में कटे परो के साथ पाया था
सुरख गाल, लम्बे घने बाल, और मुस्कराहट ले के आया था
पिचके गाल, गिनेचुने बाल, मजबूर हालात अब मेरा सरमाया था

जब अपने पुराने शहर से निकला, तो बिलकुल नया था मैं,
नए शहर पहुंचते पहुंचते मैं पुराना हो गया

शायद बिना सोचे समझे, आँख बंद कर के चला आया था
गहरी सोच में डूबा अब, दिन रात आँखों को बंद  पाया था
सकून छोड़ के ना जाने कौन से नए सकून को दूंदता आया था
सकून चैन कही छूट गए, सिर्फ मेरे साथ मेरा  साया  था

जब अपने पुराने शहर से निकला, तो बिलकुल नया था मैं,
नए शहर पहुंचते पहुंचते मैं पुराना हो गया

आपका अपना अनुराग "परदेसी" २०/०४/२०१४



Saturday, 19 April 2014

कवि की कहानी

कवि की कहानी
शब्दों के बहुत खूब सुन्दर जाल बुनते हो 
झूठे सपनो को पन्नो पर सच करते हो
आसमान से तारे तोड़ लाने का वादा करते हो 
चाँद को धरती पर उतारने के कोशिश करते हो
कवि हो या आशिक़, इसलिए ऐसी बात करते हो

ज़मीन पर उतर आयो, क्यों हवाओं में उड़ते हो
मामूली कंगन दे न सके, तारो को तोड़ने के बात करते हो
घर मैं बिजली ग़ुल है, चाँद को उतारने की बात करते हो
कल से छत टपक रही, सुहानी बरसात की बात करते हो  
कवि या आशिक़ हो इसलिए ऐसी बात करते हो

घर परिवार नहीं चलता इनसे, क्यों बेकार की बात करते हो
जाओ कुछ कर लो, क्यों कलम कागज़ बर्बाद करते हो
दुनिया को सपने दिखाते, अपनों के सपनो तो अधूरे करते हो
किराये के मकान में बैठ कर महलो की तामीर करते हो
कवि या आशिक़ हो इसलिए ऐसी बात करते हो

राजा महारजा नहीं रहे अब किस से आशीवार्द के उम्मीद करते हो
वक़्त नहीं किसी के पास, व्यर्थ में दुनिया से दाद की उम्मीद करते हो
तुम कलम के सिपाही हो, हमेशा सपनो की दुनिया की उम्मीद रखते हो
अपनी उम्मीद का दीया जलाये, तुम किसी से कहा कोई उम्मीद रखते हो 
कवि या आशिक़ हो इसलिए ऐसी बात करते हो 

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १७/०४/२०१४


Friday, 18 April 2014

धमाका

धमाका

आज सुबह पुराने चौक में बहुत ज़ोरदार धमाका हुआ, सुना दो घायल और चार चल बसे

असलम दर्जी की दुकान पर नया जोड़ा सिलवाने आये गोविन्द बिना जोड़े पहने चल बसे
गिरधारी चाय वाले के पास बैठे हमीद भाई अपनी चाय के कप को बिना पीये ही चल बसे
तरलोक सिंह जी ने तो बड़ा ग़ज़ब कर दिया सब्जी का थैला बिना घर पहुंचाए ही चल बसे
बहुत नाराज़ हूँ, दोस्तों से सब अपना काम बीच में अधूरा छोड़ और मेरे बिना ही चल बसे

उन दरिंदो से एक ही सवाल है मेरा, क्या करने आये थे और क्या कर के चल दिए ?
क्या मुस्लमान को मारने आये थे और हिन्दू को मार के चल दिए?
या फिर हिन्दू को  मारने आये थे, और मुस्लमान को मार के चल दिए ?
तुम हिन्दू मुस्लमान, तुम तो अपने अंदर के इंसान को मार के चल दिए

आज सुबह पुराने चौक में बहुत ज़ोरदार धमाका हुआ, सुना दो घायल और चार चल बसे

शहर खामोश है, कोई शोर नहीं,सारा सुनसान जंगल सा दीखता है
जंगल में कभी हाथी हाथी को मारता, हिरन हिरन को मारता नहीं दीखता है
इंसान ही एक ऐसा अकेला जानवर है जो दूसरे इंसान को मारता दीखता है
इतना नीचे गिर गया है के अब उस से जंगल का जानवर बेहतर दीखता है

आज सुबह पुराने चौक में बहुत ज़ोरदार धमाका हुआ, सुना दो घायल और चार चल बसे

शहर रहने के लायक नहीं, हर आदमी इसमें डरा सा लगता है
मैं भी डरता हूँ, अब अपने को तो जंगल ही हरा भरा लगता है
इंसान के हाथो मरने से, जानवर के हाथो मरना अच्छा लगता है 
आजकल जानवर इंसान और इंसान जानवर सा लगता है

आज सुबह पुराने चौक में बहुत ज़ोरदार धमाका हुआ, सुना दो घायल और चार चल बसे

आपका अपना अनुराग " परदेसी" १६/०४/१४


Monday, 14 April 2014

उसकी मौत हो गयी

इंसानियत की मौत

आज सुबह अखबार के किसी कोने में पढ़ा की इंसानियत की मौत हो गयी
पढ़ के मैं चौंका नही, चलो अच्छा है बहुत परेशान थी चैन की नींद सो गयी

सुना बड़े दिनों से बीमार थी, कुछ चंद लोगो की थकी हुई सांसो के सहारे जिंदा थी 
कोई शोक में नही है, क्यूँकि किसी को पता ही नही था के वो अब तक जिंदा थी 
हम सब ने धीरे धीरे तड़पा तड़पा के मारा था उसको, ना जाने फिर कैसे जिंदा थी
याद है उसके अन्तिम दिनों में उसकी गीली आँखें, हम सब को देख कितना शर्मिंदा थी

आज सुबह अखबार के किसी कोने में पढ़ा की इंसानियत की मौत हो गयी
पढ़ के मैं चौंका नही, चलो अच्छा है बहुत परेशान थी चैन की नींद सो गयी

बचपन में कितना हँसती, हर घर,हर गली में बिखरी मिलती थी 
कभी लालच की खाँसी और जलन के बुखार से बीमार हो जाती थी 
माँ कि दियी हुई संतोष और प्यार कि दवाई से तुरंत ठीक जाती थी 
तबीयत ज्यादा बिगड़ती तो पिता की फटकार के टीके से सही हो जाती थी

आज सुबह अखबार के किसी कोने में पढ़ा की इंसानियत की मौत हो गयी
पढ़ के मैं चौंका नही, चलो अच्छा है बहुत परेशान थी चैन की नींद सो गयी

इंसानियत फिर जवानी में कदम रख् कर, तो दोस्तों यारों के साथ जवान हुई
अपने नशे में, ग़रूर में, बिना किसी के लिहाज और परवाह के परवान हुई
माता पिता गुरु सब हालात से मजबूर, उनके सामने जख्मी और लहूलुहान हुई 
भूल गयी सब संस्कार और सम्मान, देखते देखते आँखों के सामने कुर्बान हुई
  
आज सुबह अखबार के किसी कोने में पढ़ा की इंसानियत की मौत हो गयी
पढ़ के मैं चौंका नही, चलो अच्छा है बहुत परेशान थी चैन की नींद सो गयी

झूठ, धोखे की बीमारी ने ऐसा पकड़ा की उसका शरीर ज़हर का प्याला  हो गया
बुढ़ापे की दहलीज़ पर पहुँचने  से पहले ही शरीर अधमरा और काला हो गया
कुछ भलो ने उसे बचाने की नाकाम कोशिश की उनका समाज से निकाला हो गया
दुनिया में आज से इंसानियत का धंधा बंद है, क्योकि उसका आज पूरा दिवाला हो गया

आज सुबह अखबार के किसी कोने में पढ़ा की इंसानियत की मौत हो गयी
पढ़ के मैं चौंका नही, चलो अच्छा है बहुत परेशान थी चैन की नींद सो गयी


Aapka apna Anurag “Pardesi”

Thursday, 10 April 2014

बाबु जी की कुर्सी

बाबु जी की कुर्सी 

आज मुन्ने की ज़िद करने पर माँ ने उसको पुरानी कुर्सी बाहर निकाल कर दी थी 
कब से  मैं, पीछे वाले कमरे में, धूल भरी, पुराने सामान के साथ अधमरी पड़ी थी 
बरसो के बाद मैं अपने पुराने  कोने में बैठक के अंदर फिर ख़ुशी से तन के खड़ी थी 
पुरानी यादो के मंजर के कहानी, जैसे कल की बात हो, मेरे सामने दीवार पर जड़ी थी

मैं हूँ बाबु  जी की कुर्सी

शहर की  सब से आलिशान और ऊँची दुकान में जब बाबु जी मुझे लेने आये थे
मुझे अखरोट की लकड़ी से तराशने वाले युसूफ चाचा से वो लम्बे समय बतियाये थे 
अपना घर छोड़ने पर उदास थी, पर थोड़ी ख़ुश की  मेरे कदरदान मुझे लेने आये थे
धीरे धीरे बहुत प्यार से युसूफ चाचा  मुझे ठेले पर बिठा कर विदा करने आये थे

मैं हूँ बाबु  जी की कुर्सी

बाबु जी के बंगले के द्वार पर उनके सारे परिवार वाले मुझे देखने आये थे
बाबु जी मुझे अपने सामने घर की बैठक के अंदर बड़े प्यार से सजा आये थे
मैं बाबु जी की चहेती थी, उनकी इजाजत बिना कोई भी मेरे पर कहां बैठ पाये थे 
सुबह चाय और अखबार, श्याम को रेडियो मैं और मेरे साथ बाबू जी सुनते आये थे 

मैं हूँ बाबु  जी की कुर्सी 

रोज की तरह आज सुबह मैं बाबु  जी की अखबार थामे उनके इंतिजार में थी
एक लम्बे सन्नाटे के बाद सारे घर में सिर्फ घर वालो की चीख और पुकार थी
बाबू जी के गुजर जाने के बाद बैठक में अब विदेशी महंगे सामान की भरमार थी
मेरी जगह लेने अब एक मरे जानवर के चमड़े से सिली एक नयी कुर्सी तैयार थी

मैं हूँ बाबु  जी की कुर्सी 

बाबु जी के दुलारे पोते की जिद वाबजूद, मुझे घरवाले  अँधेरी कोठरी में छोड़ आये थे
मेरे जैसे कितने जाने जहां बरसो से क़ैद, उन सब की ज़िन्दगी में ऐसे मोड़ आये थे
इस अकेलेपन से, मुझे महसूस हुआ जैसे पीपल के नीचे मरने के लिए छोड़ आये थे  
आज फिर पोते की जिद पर घरवाले जिस कोने से मेरी कहानी शुरु हुई वही पर ले आये थे  
   
मैं हूँ बाबू जी की कुर्सी 

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १०/०४/२०१४