Sunday, 30 March 2014

किताब

किताब

“हर एक की ज़िन्दगी की किताब उस के अन्दर किसी कोने में पड़ी है
खुद की लिखी हुई ,ख़ुद की पढ़ी हुई, अंदर  किसी  कोने में पड़ी  है “

किसी की पूरी बंद ,किसी की थोड़ी बंद, किसी की ज़रा सी खुली पड़ी है I
हमारी असली तस्वीर, सच्ची कहानी  इस के पन्नो पे लिखी पढ़ी है I
तुम्हारे दर्द और आंसू, तुम्हारे किस्से और राज, तुम्हारी सच्चाई में लिपटी पड़ी  है I
सब कहते हमारी ज़िन्दगी खुली किताब, हम जानते कहा यह खुली पड़ी है I

“हर एक की ज़िन्दगी की किताब उस के अन्दर किसी कोने में पड़ी है
खुद की लिखी हुई ,ख़ुद की पढ़ी हुई, अंदर  किसी  कोने में पड़ी  है “

किसी की थोड़ी रंगीन और नमकीन , किसी की थोड़ी काली,थोड़ी सफ़ेद पड़ी है I
हिम्मत नहीं उसको बाज़ार में रखने की , इसलिए दिल की अलमारी में पड़ी है I
रिश्ते टूट न जाये, अपने  रूठ न जाये, अच्छा है बंद है , बंद पड़ी है
डरते है कही पन्ने खुल न जाये ,इसलिए अच्छा है जब तक उस पे धूल पड़ी है I

“हर एक की ज़िन्दगी की किताब उस के अन्दर किसी कोने में पड़ी है
खुद की लिखी हुई , ख़ुद की पढ़ी हुई, अंदर  किसी  कोने  में  पड़ी  है”

दूसरो की लिखी किताबे बहुत पढ़ी, पर तुम्हारी किसी ने नहीं पढ़ी है
कुछ तो है जो छुपाते हो, मंद मंद मुस्कुराते हो, किसी ने नहीं पढ़ी है
क्या बिलकुल ही फीकी है या बहुत तीखी है, किसी ने नहीं पढ़ी है
इशारो में बता तो दो,कुछ समझा तो दो, किसी ने नहीं पढ़ी है

“हर एक की ज़िन्दगी की किताब उस के अन्दर किसी कोने में पड़ी है
खुद की लिखी हुई , ख़ुद की पढ़ी हुई, अंदर  किसी  कोने  में  पड़ी  है”

कभी कभी  सोचते  है कुछ वक़्त बीत जाने के बाद अपना अफसाना लिखेगे ?
खाली पैमाना  भर के , होश में बैठ ,तब पुरा का पुरा  तराना  लिखेगे ?
यह वादा है के अलविदा कहने के पहले सारा का सारा लिखगे ?
कभी कभी  सोचते  है कुछ वक़्त बीत जाने के बाद अपना अफसाना लिखेगे ?

“हर एक की ज़िन्दगी की किताब उस के अन्दर किसी कोने में पड़ी है
खुद की लिखी हुई , ख़ुद की पढ़ी हुई, अंदर  किसी  कोने  में  पड़ी  है”

आपका अपना अनुराग "परदेसी" ३०/३/१४

Thursday, 27 March 2014

माँ

      माँ

अभी भी कभी कभी माँ तेरी बहुत याद आती  है
आसमां  देखता हूँ तो तारो के संग बैठी मुस्कुराती है
कभी नींद न आये तो अब भी मुझे आँचल में सुलाती है
गर्मी में अभी भी ठंडी हवा बन के मुझे छू जाती है  
अभी भी कभी कभी माँ तेरी बहुत याद आती  है

अरसा गुजर गया गए हुए पर अभी भी सामने नज़र आती है
तेरी रोटी की सोंधी खुश्बू मेरे मुंहू में अभी भी आती है
कमीज के टूटे बटन में तेरे सुई दागे कि सिलाई साफ आती है
पुराने गीतो में तेरी आवाज़ भी कभी कभी घुंघुनाती है
अभी भी कभी कभी माँ तेरी बहुत याद आती  है

चिठी न लिखी  उसे समय पर वो  करती रही इंतजार है  
खूब मस्ती कि दोस्तों के साथ कि न उस से बाते दो चार है
नहीं कभी उसने फटकारा,हमेशा किया प्यार और दुलार है
बहुत करता हूँ अब याद पर वो चली गयी उस पार है
अभी भी कभी कभी माँ तेरी बहुत याद आती  है

कभी कभी आज दिल छोटे मुन्ने जैसा महसूस करता  है
हमेशा अपनी माँ का छोटा बेटा बने रहने का मन करता है
बुखार में तेरे हाथो से दवाई खाने का मन करता है
तेरी कहानिया और लोरी सुनने का मन करता है
अभी भी कभी कभी माँ तेरी बहुत याद आती  है

तुमारा सिर्फ तुमारा अनुराग  २७/३/१४

Wednesday, 26 March 2014

एक में दुसरे को ढूंढते है

एक में दुसरे को ढूंढते है
ना जाने हम क्यों एक आदमी में दुसरे आदमी को ढूंढते है
भगवान ने तराशा सब को अलग, फिर न जाने क्यों ढूंढते है
किसी कि बुराई और किसी की अच्छाई किसी और में ढूंढते है
राम में कृष्ण की मस्ती, और कृष्ण में राम जैसे बड़ा भाई ढूंढते है
सीता में राधा का प्यार और राधा में सीता का बलिदान ढूंढते है

अपनी नई नवेली बीवी में अपनी माँ को ढूंढते है
अपने पति में अपने पिता कि पुरानी तस्वीर को ढूंढते है
छोटो में बड़ो सी अक्कल और बडों में छोटों की मासूमीत ढूंढते है
नए मिलें दोस्त में पुराने बिछड़े दोस्त के साथ बिताये पल ढूंढते है
ना जाने हम क्यों एक आदमी में दुसरे आदमी को ढूंढते है

नदी के पानी में नमक और सागर के पानी में मिठास ढूंढते है
चाँद में सूरज की गर्मी और सूरज में चाँद की शीतलता ढूंढते है
बगीचे में खूबसूरत दिखने वाले फूलो में खुश्बू को ढूंढते है
पत्थर दिल हसींन चहरो में मौम जैसे पिगलते दिल ढूंढते है
ना जाने हम क्यों एक आदमी में दुसरे आदमी को ढूंढते है

अपने बच्चो में अपने बचपन की पुरानी परछाई ढूंढते है
अपने अधूरे सपनो को पूरा होने की चाहा उनमे ढूंढते है
एक कवी अपनी बेटी में अपनी कलम की स्याही ढूंढते है
पुराने फौज़ी अपने कमजोर बेटे के दिल में सिपाही ढूंढते है
ना जाने हम क्यों एक आदमी में दुसरे आदमी को ढूंढते है

कवि का बेटा सिपाही और सिपाही का बेटा कवि हो,क्यों नही समझते है
सीता राम की और कृष्ण राधा का है ना जाने ये क्यों नही समझते है
बीवी को बीवी, माँ को माँ, और छोटे को छोटा क्यों नही समझते है
अगर हम सब ऐसा सोचे समझे,तो फिर कहा अपने रिशते टूटते  है
ना जाने हम क्यों एक आदमी में दुसरे आदमी को ढूंढते  है

आपका अपन अनुराग "परदेसी" २५/३/२०१४


Monday, 24 March 2014

गुमशुदा

गुमशुदा

माता पिता ने दिए संस्कार,और गुरु ने दिया हम को ज्ञान
तब कही अन्धेरे से निकल कर आदमी बन सका एक इंसान
आजकल बहुत कम दिखता है, गुमशुदा ही हो गया है इंसान
भीड़ में कही खो गया,अपने को ही तलाशता है अब इंसान
तेज़ रोशनी की चकाचौंद में शायद आँखें मीच बैठा है इंसान  

मन्दिर मस्जिद बहुत बना दिए,पर उनमें नही रहा अब भगवान
इन में जो बन के बैठे ज्ञानी वो ही बाँट रहे बाँटने वाला ज्ञान
देखते देखते ही कल के यह  फ़कीर बन गए रातों रात धनवान
धर्म के नाम पर सेक रहे रोटी और लड़ा रहे इंसान से इंसान
यह क्या दूसरों को बना पाएगे, जब खुद ही यह बन चुके हैवान

"माता पिता ने दिए संस्कार,और गुरु ने दिया हम को ज्ञान
तब कही अन्धेरे से निकल कर आदमी बन सका एक इंसान
आजकल बहुत कम दिखता है, गुमशुदा ही हो गया है इंसान"

माँ बाप के पास वक़्त नहीं, बनाने में लगे है इस उम्र अपनी पहचान
गुरु भी बिना मोल तोल, बिना पहले लिए दक्षिणा आजकल नहीं देते ज्ञान
बिना दौलत बिना झूठी शौहरत आज की दुनिया में कोई कहा बन पाया महान
ईमानदारी, सचाई ,सब बिकता है, मोल तो लगा के देखो क्यों बने हो मेहमान
कौन लिखता है अब सफ़ेद कागजो पर, इसलिए कभी भी तोड़ देते है दी हुई जुबान

"माता पिता ने दिए संस्कार,और गुरु ने दिया हम को ज्ञान
तब कही अन्धेरे से निकल कर आदमी बन सका एक इंसान
आजकल बहुत कम दिखता है, गुमशुदा ही हो गया है इंसान "

आपका अपना अनुराग "परदेसी" २४/३/१४
 

Friday, 21 March 2014

ज़िन्दगी की सुबह और शाम

ज़िन्दगी की सुबह और शाम

“सुबह हो गयी, अब शाम ढलने को है”

ज़िन्दगी की आने वाली सुबह और दूसरी तरफ ढलने वाली शाम को देखता हूँ
सुबह सुबह बच्चों को स्कूल और बडों को अपने काम पर जाता देखता हूँ
एक तरफ मुस्कराते चेहरे और दूसरी तरफ़ माथे की शिकन देखता हूँ
एक दूसरे के कंधो पर रखे हाथ और दूसरी तरफ जेब में पड़े गीले हाथ देखता हूँ
एक पर लदे बस्ते का बोज और दूसरी तरफ खाली पर फिर भी झुके कंधे देखता हूँ
बेफिक्री और फ़िक्री दोनों को आमने सामने अपने नजरों से देखता हूँ
एक तरफ़ शोर और दूसरी तरफ़ खामोशी, ना जाने क्या क्या सोचता हूँ
एक तरफ़ बरसों पुराना आइना है और एक तरफ सच्चाई, सोचता हूँ.
बीते हुए कल और आने वाले कल के बीच में खड़ा होकर फिर सोचता हूँ
ज़िन्दगी की आने वाली सुबह और दूसरी तरफ ढलने वाली शाम को देखता हूँ


दिन ढलते ही सब पंछी लंबी कतारों में अपने घोंसलों की और उड़ने लगे है
बचपन में घंटो दौड़ा, अब हम घडी को देख देख कर चलने भर लगे है
पहले कुछ भी खा लेते अब कुछ भी खाने से पहले चार बार सोचने लगे है
अभी आठ भी नहीं बजे और वो सब अपनी आँखों को मलने लगे है
एक हम है जो लेटे लेटे हर रोज की तरह तारो को गिनने लगे है
और हम तो सुबह होने से पहले ही पौधो को जगा के पानी देने लगे है
दिन ढलते ही सब पंछी लंबी कतारों में अपने घोंसलों की और उड़ने लगे है


ज़िन्दगी की रेलगाड़ी अब थोड़ी धीमी धीमी होने लगी है
ऐसा लगता है कुछ दिनों रुक रुक कर बैलगाड़ी होने लगी है
कुछ मुसाफिर पहले उतर गए, इसलिए अब खाली होने लगी है
सीट के नंबर मिट गए,अब गाड़ी की सीटे भी पुरानी होने लगी है
सब तरफ चुप्पी है, सिर्फ रेलग़ाडी की धक् धक् सुनाई देने लगी है
कुछ सो गए, कुछ अभी भी जागे , काली रात और अँधेरी होने लगी है
उजाला हो गया, कुछ नए राहगीरो से रेलगाड़ी फिर भरने लगी है
चंद बची हुई सवारी, अपने को समेट उतरने की त्यारी करने लगी है
ज़िन्दगी की रेलगाड़ी अब थोड़ी धीमी धीमी होने लगी है


  कहते है शायर अनुराग "परदेसी "   “सुबह हो गयी, अब शाम ढलने को है”

आपका अपना अनुराग "परदेसी" २१/३/२०१४

Wednesday, 19 March 2014

धीरे चलो

धीरे चलो

धीरे चलो, ज़रा हौले चलो, धीमे चलो ज़रा हौले चलो
धीरे चलो, ज़रा हौले चलो, धीमे चलो ज़रा हौले चलो

ज़माने से अलग चलो, पीछे मुड़ मुड़ के देख के चलो
दौड़ के जल्दी नहीं, आराम से टहलते टहलते भी  चलो
आँखें खोल के नहीं, कभी मस्ती में बंद कर के भी चलो
दिन में फूलो को छूते, रात में तारो को गिनते गिनते चलो
होश में हमेशा चलते हो, कभी झूमते झूमते  भी चलो
अकेले नहीं, उदास नहीं, सब के  साथ मुस्कराते चलो
हमेशा जूतो में, कभी नंगे पांव गीली घास पर भी चलो
बारिश में दौड़ते बच्चों के साथ कदम से कदम मिला के चलो

धीरे चलो, ज़रा हौले चलो, धीमे चलो ज़रा हौले चलो
धीरे चलो, ज़रा हौले चलो, धीमे चलो ज़रा हौले चलो

ज़िन्दगी में थक जायो तो , थम जाओ ,दो साँस ले के फिर चलो
प्यासे हो तो, रुक जाओ  सूखे होंटो पर पानी के दो बुँदे टपका के चलो
कभी किसी का हाथ पकडे, कभी किसी को अपनी उंगली पकड़ाते चलो
हमेशा हवाओं में उड़ते रहते तो,  कभी तो ज़मीन पर भी चलो
दिमाग से हमेशा नहीं, कभी अपने दिल की आवाज सुन के चलो
हमेशा हिसाब में लगे रहते हो,कभी बेहिसाब, बिना हिसाब भी चलो
इतना भी संभल के नहीं, कभी गिर के,फिर उठ के चलो
अपनी मिटी पर अपने कदमो के निशान बनाते बनाते चलो

धीरे चलो, ज़रा हौले चलो, धीमे चलो ज़रा हौले चलो
धीरे चलो, ज़रा हौले चलो, धीमे चलो ज़रा हौले चलो

आपका अपना अनुराग -"परदेसी" १७/०३/१४


Sunday, 16 March 2014

आखरी ख़वाहिश    

यारो अब तक न माँगा तुमसे कुछ , पर मेरी तुम आखरी खवाहिश पूरी कर देना
बहुत दूर निकल आया अपने गाँव से मुझे तब मेरे गाँव  जरूर पहुंचा  देना 
मत तोडना मेरे लगाये फूलो को, मुझे उनके बिना सफ़ेद रंग से ही सजा देना
मुझे सुबह नहला के, सूरज कि पहली किरण का  मेरे मुह से  स्पर्श करा देना
गाड़ी में बिलकुल नहीं अपने चार कंदो पर मुझे मेरी गली कूचो  में घुमा देना
यारो अब तक न माँगा तुमसे कुछ , पर मेरी तुम आखरी खवाहिश पूरी कर देना

मत बहाना आंसू , मत बहाना आंसू ,जाते जाते मुझे मेरे लिखे गीत सुना देना
मेरे चंद जिगरी दोस्तों को बिना मिले नहीं जा सकता, उनको खबर भिजवा देना
मेरे चंद पुराने  दुश्मनो को मेरे जाने की यह खुशी की खबर जरुर भिजवा देना
करंट छूने से डर लगता है , मुझे चन्दन न सही,आम की लकड़ी पे ही लिटा देना
यारो अब तक न माँगा तुमसे कुछ , पर मेरी तुम आखरी खवाहिश पूरी कर देना

कही प्यासा न चला जाऊ मेरे सूखे होंठो में मेरी मनपसन्द शराब के दो बूंद टपका देना 
परदेस की मिट्टी  में  नहीं, मुझे देस में अपनों के साथ ही हमेशा के लिए सुला देना
डूबने से डरता हूँ, इसलिए मेरी धूल को समुंदर में नहीं, धूल में ही मिला देना
अपनी ज़िंदगी को मत रोकना एक पल भी , मुझे जल्दी से जल्दी भुला देना
यारो अब तक न माँगा तुमसे कुछ , पर मेरी तुम आखरी खवाहिश पूरी कर देना

अगर किसी का उधार न चुका पाया,तो उसको दोस्त समझ के माफ़ कर देना
पर मेरी एक हंसती हुई तस्वीर जरूर मेरे घर की किसी दीवार पर लगा देना
बहुत खुश हूँ अपनी माँ के पास जा रहा हु, उसको यह मेरा सन्देश भिजवा  देना
परदेस में दीवाली नहीं मन सका, हर दीवाली पे मेरे नाम का एक दिया जरूर जला देना
यारो अब तक न माँगा तुमसे कुछ , पर मेरी तुम आखरी खवाहिश पूरी कर देना


आपका अपना अनुराग १६//१४
                         कहानी

बचपन में हम सब ने सुने कितने किस्से  और कितने  कहानी
कुछ माँ के मुँह से और कुछ बूढ़ी नानी के ज़ुबानी
किसी में थी परिया और किसे में महलो के राजा रानी
कुछ झूटी कुछ सची पर उनको सुन कर नीद आती थी  सुहानी
बचपन में हम सब ने सुने कितने किस्से  और कितने  कहानी

अब तो इतना वक़्त गुजर गया पर अब  तक सुन रहा हूँ कहानी
कभी बाज़ारों में कभी महफ़िलों में पर  लगती सब की  सब अन्जानी
किसको सच मानू और किसको मानू  झूठा बहुत है मुझे परेशानि 
असमंजस में हूँ किस पर करू विश्वास और किस पे ढालू पानी
बचपन में हम सब ने सुने कितने किस्से  और कितने  कहानी

आज के ज़माने में सब हदे पार कर गयी सफ़ेद झूठी कहानी
छोटी से चाह के लिए लोग अपनों की  ही लगा देते है क़ुरबानी
सिर्फ चन्द सिक्कों  की लिए ही लोग भूल जाते है दोस्ती  पुरानी
रिश्तो तक को तोलती है तराजू  में यह अब दुनिया बेगानी
बचपन में हम सब ने सुने कितने किस्से  और कितने  कहानी

ऐसा लगता है हमारे जीवन में अब सब से अहम है कहानी
होश में आने पर सर की ऊपर से गुजर चूका होता है पानी
आखरी दिनों जब नातियों को सुना रहे  होते है किस्से  और कहानी
तब फिर लौट आती है बचपन कि परिया और महलों की राजा रानी
बचपन में हम सब ने सुने कितने किस्से  और कितने  कहानी


" यही है दोस्तों आज के इंसान की  सच्ची कहानी"


आपका अपना अनुराग  ०८/०१/२०१४

चल दिए

चल दिए 

हम उनको मिल कर जी भर रो भी नहीं पाये और वो चल दिए
हम अपने आंसुओ का पूरा मजा भी नहीं ले पाये और वो चल दिए
बरसो जिनका किया इंतजार वो न जाने कब आये और कब चल दिए
आँखें देखती रही राह वो न जाने कौन रास्ते आये और कौन रास्ते चल दिए
हम उनको मिल कर जी भर रो भी नहीं पाये और वो चल दिए

बादल तो बहुत काले और घने थे पर बिना बरसे ही चल दिए
धरती के फटे सूखे होंटो को बिना चूमे बिना छुए ही चल दिए
हमारे तो अभी पर भी नहीं निकले और वो ऊँची उड़ान भर चल दिए
हमारे धड़कते दिल को तोड़ वो न जाने किसके दिल के होकर चल दिए
हम उनको मिल कर जी भर रो भी नहीं पाये और वो चल दिए

न जाने हमको क्यों तनहा छोड़ वो कौन सी महफ़िलो की और चल दिए
शायद हमारा रंग पक्का न था वो न जाने किसके रंग में रंगने चल दिए
हमारा नशा कच्चा था वो न जाने किसके क़े नशे में डूबने क़े लिए चल दिए
हमारा सुर शायद फीका था वो न जाने किस सुर कि तलाश में चल दिए
हम उनको मिल कर जी भर रो भी नहीं पाये और वो चल दिए

अपनी यादों को हमारे पास छोड़ वो न जाने कौन सी नयी कहानी लिखने चल दिए
हमारे आँगन में नीम का दरख़त लगा के वो न जाने क्यों सारे फूलो को तोड़ चल दिए
हमको चार दीवारो में भीगता छोड़ न जाने हमारे घर की छत क्यों उडा कर चल दिए
हमको इस गहरे समुन्दर में उम्र भर के लिए प्यासा छोड़ न जाने कौन किश्ती में बैठ चल दिए
हम उनको मिल कर जी भर रो भी नहीं पाये और वो चल दिए

आपका अपना अनुराग १०/३/२०१४