Wednesday, 24 September 2014

असमंजस

असमंजस
दिल की सुनू या दिमाग की सुनू
हमेशा असमंजस में रहता हूँ I
किसकी सुनू और किसकी न सुनू,
हमेशा उलझन में रहता हूँ I
दोनों से खून का रिश्ता,
दोनों मेरे ही गावं के,
दोनों पडोसी I
एक की सुनू तो दूसरा नाराज,
क्या करू दोनों ही हैं मेरी आवाज I
हमेशा असमंजस में रहता हूँ,
किसकी सुनू और किसकी न सुनू I
कभी दिमाग से सोचता हूँ I
कभी दिल से सोचता हूँ I
जब दिमाग से सोचता हूँ, तो हमेशा मंजिल तक पहुंचता हूँ I
जब दिल से सोचता हूँ, तो हमेशा धोखे वाली गली पहुंचता हूँ I
न जाने फिर भी दिल की ज़्यादा, दिमाग की कम सुनता हूँ I
नफे नुकसान का हिसाब नहीं, पर ज़िन्दगी जीता हूँ I
दिमाग तो ऊपर है, दिल को अपने दिल के बहुत पास रखता हूँ
हमेशा असमंजस में रहता हूँ,
किसकी सुनू और किसकी न सुनू I
दिमाग ने बहुत बार बचाया,
दिल ने हर बार लुटाया I
दिमाग देता दौलत और सरमाया,
दिल ने दया और प्यार का पाठ पढ़ाया I
दिमाग ने पैसा कमाया,
पर दिल ने सब खर्च करवाया I
हमेशा असमंजस में रहता हूँ,
किसकी सुनू और किसकी न सुनू I
दिमाग हिसाब में बहुत पक्का,
दिल को हिसाब बिलकुल समझ नहीं आया I
दिमाग कभी कभी थक कर सो जाता,
दिल ने दिन रात हंसाया और कभी कभी रुलाया I
दिमाग कभी रिश्तो को नहीं समझ पाया,
उसमे हर बार दिल ही अव्वल आया I
हमेशा असमंजस में रहता हूँ,
किसकी सुनू और किसकी न सुनू I
आपका अपना अनुराग "परदेसी" २१/०९/२०१४

Sunday, 21 September 2014

फ़रियाद

फ़रियाद
ज़िंदा रहने की आदत नहीं रही,
फिर भी दिन रात जीते,
पर अब जीने में पुराने दिनों जैसी बात नहीं आती I
तेरी खुशबू, सिर्फ तेरी थी,
बाजार में फूल बहुत पर उनकी खुशबू में तेरी खुशबू नहीं आती I
जब से हम तुम जुदा हुए तेरी याद बहुत आती,
यह आलम की तेरी यादो की भी याद आती I
लगता है अब हमारी सांसे मरने लगी,
अब सांसो में साँस नहीं आती I
प्यार तो बहुत बिकता
पर उनके प्यार में तेरे प्यार जैसी इबादत नहीं आती I
ज़िंदा लाश बने फिरते है गली कूचों में,
मौत के धुएं के दो कश लेते जब, वही दो पल जी लेते है I
मुरझा गए है, अब पानी न पिलायो
ज़हर के दो घूंट जब पीते, वही दो पल जी लेते है I
आँखों में चुबती है रौशनी, दीये न जलायो,
जब बुझते सारे दीये, वही दो पल जी लेते है I
पुराने ज़ख्म न कुरेदो, मलहम खत्म हो चुकी,
नए ज़ख़्म जब लगते, वही दो पल जी लेते है I
आंसू नहीं बहते अब आँखें पत्थर हो चुकी,
कभी जब दिल नम होता, वही दो पल जी लेते है
ज़िंदा रहने की आदत नहीं रही,
फिर भी दिन रात जीते,
पर अब जीने में पुराने दिनों जैसी बात नहीं आती
आपका अनुराग "परदेसी" २०/०९/२०१४

Friday, 19 September 2014

यादें

यादें
ज़िन्दगी के सफर में क्या क्या पीछे छूट जाता है,
कभी सोचा नहीं कौन कब कैसे क्यों छूट जाता है,
कुछ याद रहता कुछ न जाने क्यों भूल जाता I
कुछ तो याद,
कुछ तो याद के आईने के सामने नहीं आता,
कुछ लम्हे उम्र भर याद,
पर इंसान कितने साल ऐसे ही भूल जाता,
कड़वा स्वाद उम्र भर,
मीठा मुह का स्वाद छोड़ जाता I
ज़िन्दगी के सफर में क्या क्या पीछे छूट जाता है,
कभी सोचा नहीं कौन कब कैसे क्यों छूट जाता है,
कुछ याद रहता कुछ न जाने क्यों भूल जाता I
कुछ लम्हों का रहता बरसो इंतजार,
कुछ को याद करते हम बार बार,
कुछ भूलने भी भूलते नहीं,
हमेशा दिल पे करते वार,
कुछ तो दुनिया वाले भूलने नहीं देते,
कोशिश करो तुम चाहे हज़ार I
ज़िन्दगी के सफर में क्या क्या पीछे छूट जाता है,
कभी सोचा नहीं कौन कब कैसे क्यों छूट जाता है,
कुछ याद रहता कुछ न जाने क्यों भूल जाता I
कहानिया तो बहुत लिखते,
ज़्यादा अधूरी रह जाती,
चंद ही मुक्मल हो पाती,
जो मुक्मल हुई,
वो सब भी मुकाम नहीं पाती,
जो मुकाम तक पहुंची,
वही अपने को याद रह जाती I
ज़िन्दगी के सफर में क्या क्या पीछे छूट जाता है,
कभी सोचा नहीं कौन कब कैसे क्यों छूट जाता है,
कुछ याद रहता कुछ न जाने क्यों भूल जाता I
आपका अपना अनुराग "परदेसी" 14/09/2014

दिन और रात का खेल

दिन और रात का खेल
दिन उजालो का रात अंधेरो की I
दिन तुम्हारा, रात गुस्ताखों की I
दिन हजारो का रात लाखो की I
दिन मज़बूरी का रात ख्वाबो की I
सूरज, चाँद ने देखो क्या क्या रंग खिलाये I
दोनों ने अपने गोरख धंधे के कैसे जाल बिछाये I
फूल सुबह चढ़े मंदिर, रात को हसीन ग़ज़रा बन जाये I
धुप में काला चश्मा, रातो को रंगीन हो जाये I
एक बहाये पसीना, दूसरा पाप की गठरी उठाये I
दिन ईमान, रात बेईमान I
दिन भगवान, रात शैतान I
दिन इंसान, रात हैवान I
दिन बचपन, रात जवान I
गंगा जल का प्याला, रात को ज़ाम बन के छलक जाये I
सोता समुन्दर, रातो में ने जाने किसको आवाज लगाये I
दिन में किये वादे सच्चे, रात के कौन सुबह याद दिलाये I
असली नकली की परख रौशनी में,अंधेरो में सब सजधज के आये I
दिन उजालो का, रात अंधेरो की I
दिन तुम्हारा, रात गुस्ताखों की I
आपका अनुराग "परदेसी" १७/०९/२०१४

Thursday, 11 September 2014

आज की भक्ति

आज की भक्ति

साधु संतो ने जंगल पहाड़ छोड़ दिए,
और शहरों में डाल दिया डेरा I
ईशवर भी ढूंढते उनको,
कहां छोड़ के चले सब घर मेरा I

चोला, माला, कमंडल, आसन यह सब पीछे छोड़ दिया I
दुनिया की चकाचौंद के सामने, आँखों का तेज़ खो दिया I 
कीमत लगा अपने ज्ञान की, भक्ति की गंगा का रुख मोड़ दिया I 
खोखले प्रवचन, झूठे आशीर्वादों से भीड़ को अपने से जोड लिया I
श्रद्धा के झूठे सागर का करके मंथन, विष घोट के पिला दिया I
खुद तो रास्ता भटक गए, अपने साथ संसार को भी भटका दिया I

साधु संतो ने जंगल पहाड़ छोड़ दिए,
और शहरों में डाल दिया डेरा I
ईशवर भी ढूंढते उनको,
कहां छोड़ के चले सब घर मेरा I

झिलमिलाती नगरी में देखो भक्तो का अब लगता है ताँता I
चारो और भक्ति का शोर, नहीं रहा प्रभु से कोई नाता I
तेज़ रफ्तारी में हर कोई मंदिर के द्वार होकर आता जाता I
काले धन की भेंट भी चढ़ती, सब कुछ तेरी तिजोरी में समाता I
भगवन का किया इतना श्रृंगार, वो भी अपने को नहीं पहचानता I
श्रद्धा सस्ती महंगी, अब भक्त अपनी भक्ति का वजन उसी से नापता I

साधु संतो ने जंगल पहाड़ छोड़ दिए,
और शहरों में डाल दिया डेरा I
ईशवर भी ढूंढते उनको,
कहां छोड़ के चले सब घर मेरा I

आपका अपना अनुराग "परदेसी" ०५/०९/२०१४

Sunday, 7 September 2014

दरिंदे और ज़िंदा मुर्दे

Trigger for this one :
In various parts of the world evil forces are ruling the roost, governments are powerless and people are speechless. Only God knows what the endgame is ???
दरिंदे और ज़िंदा मुर्दे
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी रोती और मौत हँसती I
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी महंगी और मौत सस्ती I
दरिंदे ज़िंदा,
मुर्दे कब के सो चुके I
दरिंदे आग बरसते,
मुर्दो के हाथ ठंडे हो चुके I
दरिंदो की हकूमत,
मुर्दे पहले तख़्त खाली कर चुके I
दरिंदो का रंग अंदर से काला,
मुर्दे तो कब के सफ़ेद हो चुके I
दरिंदे हँसते,
मुर्दो के मुँह कब के सिल चुके I
दरिंदे बेचते कफ़न,
मुर्दे तो कब के दफ़न हो चुके I
दरिंदे जीते मौत के साये में,
मुर्दे मौत के साये में जी चुके I
.
यहाँ डर के नाख़ून लम्बे,
हिम्मत बर्फ हो चुकी I
यहाँ हादसों की फेहरिस्त लम्बी,
खुशियो की फेहरिस्त छोटी हो चुकी I
यहाँ हैवानियत का दरख़्त ऊँचा,
इंसानियत की बेल सुख चुकी I
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी रोती और मौत हँसती I
यह दरिंदो और ज़िंदा मुर्दो की बस्ती,
यहाँ ज़िन्दगी महंगी और मौत सस्ती I
आपका अपना अनुराग "परदेसी" ०२/०९/१४