Tuesday, 27 May 2014

मेरे मेहबूब

मेरे मेहबूब  

मेरे मेहबूब के घर से आज वो मेरे लिए उनका पहला और आखरी पैगाम ले के आये
पता चला की उनकी आखरी ख्वाइश थी वो हमारे कंधे पर अपना सर रख के जाये  
जिनको सुर्ख जोड़े में देखने की चाह थी, आज उनको सफ़ेद लिबास में देख कर आये
उनकी मांग तो सिंदूर से नहीं भर सके पर आज उनको फूलो का हार पहना आये
जिनसे ज़िन्दगी भर साथ की उम्मीद थी, आज हम उनके जनाजे में शरीक हो कर आये
सब ने उनको देख के आंसू बहाये पर वो लेटे लेटे हमारी तरफ देख कर आज मुस्कराये
हम इंतजार करते ही रहे शायद अब की बार, वो हम के देख प्यार का गीत घुनघुनाये

दुनिया ने मिलने न दिया हमको, आखिर आज हम उनको जी भर के देख पाये
आज उनके चहेरे को हम न जाने कितने बरसो की कोशिश के बाद पुरा पढ़ पाये
आज हम दुनिया के सामने पहली बार उनसे अपनी दिल की बात खुल कर कह पाये
रेशमी ज़ुल्फ़ें. बड़ी बड़ी आँखे, होठो के नीचे काला तिल, अब भी हमे बहुत सुन्दर नज़र आये 
चाँद की परछाई देखते थे आज नसीब की हम अपना चाँद अपनी आँखों से देख कर आये
उनको आखरी बार छु कर हम उनके बदन की खुशबू अपने हाथो में समेट के ले आये
मेरे मेहबूब के घर से आज वो मेरे लिए उनका पहला और आखरी पैगाम ले के आये

उनको सब उनकी कब्र में दफना आये पर हम उनको हमेशा के लिए अपने साथ वापिस ले आये
उनकी आँखों को अपनी आँखों में और उनकी दिलकश मुस्कान को अपनी दिल में क़ैद कर लाये
ज़िन्दगी में एक ने हो पाये, पर लगता है जाते जाते वो हमेशा के लिए हमारे हो पाये
हमारे कई बरसो से सूखे पड़े दरख़्त पर फिर चंद  नन्ने नन्ने  पते फूट कर  निकल आये
अब इंतजार है बेसब्री से उस दिन का जब हम भी अपनी मेहबूब के पास पहुँच पाये
खुदा ही जाने ये कैसा इश्क़ है, हम अब तक अपनी इस दास्तान को न समझ पाये
मेरे मेहबूब के घर से आज वो मेरे लिए उनका पहला और आखरी पैगाम ले के आये

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १८/०५/२०१४




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