Wednesday, 11 June 2014

ट्रैफिक की बत्ती

ट्रैफिक की बत्ती

बहुत मजा आता था बचपन में जब चौराहे पर देखते थे लाल और हरी बत्ती
मोटे हवलदार के डंडे की जगह अब गयी थी दुबली पतली पर कड़क बत्ती
हमेशा व्यस्त और गुस्से में तनी रहती थी वो चौराहे की बत्ती
तूती बोलती थी उसकी बड़ी ताक़तवर थी वो छोटी सी बत्ती   
स्कूल आते जाते कभी हमको देख के मुस्कुराती थी वो बत्ती
लाल सब को रुकवा दिया करती, और हरी सब को दौड़ा दिया करती थी बत्ती
अपने ही दम पर पूरे चौराहे को हिला दिया दिया करती थी बत्ती
दिन रात, धुप बारिश, बिना सोये हमेशा जागती रहती थी बत्ती
अख़बार,सिगरेट, खिलोने वाले सब को अपने पैरो में जगह देती थी बत्ती 
खुले आसमान के नीचे महारानी जैसे हुकूमत करती थी बत्ती

शहर बड़ा हो गया अब उतना काम नहीं कर पाती थी ट्रैफिक की बत्ती
कभी थक के परेशांन हो जाती, तो जलती बुजती रहती थी बत्ती
खम्बा भी कमजोर हो आया था जिस पर सालो से तनी रहती थी बत्ती
अब उसके ऊपर एक नया पुल बन आया था, बहुत बेबस लगती थी अब बत्ती
पुरानी सड़क पर अब कोई इका दुका साइकिल या रिक्शे ही रोक पाती थी बत्ती
सब पकड़ के निकल गए नया पुल, बहुत अकेली हो आयी थी अब चौराहे की बत्ती
एक दिन पुरानी सड़क किनारे में कचरे की साथ लहूलुहान गिरी पड़ी मिली बत्ती

बरसो के बाद

सरकार ने बत्ती कीजगह शहर के बहुत पुराने नामी गिरामी शायर का पुतला लगाया,
पुतले की नीचे शायर का कलाम  लिखवाया  

कलाम
"ज़िन्दगी की गाड़ी चलती है,कभी धीमी, कभी तेज चलती है
बत्ती लाल होने पर रूकती है, और हरी होने पर फिर चलती है
ज़िन्दगी अब उम्र के ऐसे चौराहे पर है देखो किसके की सहारे चलती है
जवानी की नयी सड़क पर, दुसरो की भी हमारे इशारे से चलती है
बुढ़ापे की टूटी सड़क पर तो अपनी ही बहुत मुश्किल से चलती है
पता नहीं कब हरी से हमेशा के लिए लाल हो जाये, देखो कब तक चलती है”


आपका अपना अनुराग "परदेसी" १०/०६/२०१४   

No comments:

Post a Comment