रिश्तो की अलमारी
आज हमने बरसो के बाद अपनी रिश्तो
की अलमारी खोली,
देखा तो बहुत धूल जम आई थी सब
रिश्तो की किताबो पर I
कुछ नयी, कुछ पुरानी,
कुछ रोती, कुछ हँसती,
कुछ घूरती, कुछ सहमी,
कुछ सस्ती, कुछ महंगी,
कुछ सोती, कुछ जागती,
सब किताबे बेतरतीब पड़ी थी I
कुछ अहम की दीमक के कीड़े खा गये, कुछ पर शक़ और परायेपन के जाले लग आये थे I
कुछ बिलकुल ठीक थी, सिर्फ एक दो पन्ने हमारी गलती से मुड़ आये थे I
कुछ बिलकुल ठीक थी, सिर्फ एक दो पन्ने हमारी गलती से मुड़ आये थे I
दूर कोने में जो पड़ी थी, उन पर
लिखे अल्फाज मिट आये थे I
ऊपर की कतार में जो नज़दीक थी,
नयी थी सिर्फ, उनके ऊपर के पेज फट आये थे I
कुछ पन्नें खुलने का इंतजार करते
करते, पड़े पड़े पुराने हो आये थे I
पुरानी को पढ़ना भूल गए थे, हर
महीने नयी किताबे खरीद लाये थे I
दुनिया को रिझाने के लिए, कुछ नापसंद किताबे भी खरीद के ले आये थे I
कुछ मनपसंद किताबे, चंद सिक्को की खातिर बाजार में भी बेच आये थे
I
आज हमने बरसो के बाद अपनी रिश्तो
की अलमारी खोली,
देखा तो बहुत धूल जम आई थी सब
रिश्तो की किताबो पर I
पुरानी किताबे है, कुछ को थाम हाथ खुशक, कुछ को पढ़ के आँख नम हो आये I
थोड़ी सी प्यार की धुप लगाने से,
किताबो के सारे पन्ने नए हो आये I
बरसो पुरानी पड़ी किताबो के पन्ने,
हमारे छूने भर के अहसास से खिल आये I
देर से ही सही, इस बार हम तो अपनी अलमारी खोल के साफ कर आये I
ज़िन्दगी की लाइब्रेरी में, सब किताबो को उनकी जगह सजा आये I
नयी पुरानी सब को खोल के, अपनों के प्यार की हवा लगवा लायेI
अब किताब के दाम
से उसकी कीमत नहीं आंकते, जैसा हम बरसो से करते आये I
अब तो आँखों के सामने खोल के रखी, ताकि गलती से फिर धूल न जम जाये I
अब किताबे पढ़ते लिखते रहते है, ताकि ज़िन्दगी मुस्कुराती रहे और दोबारा न रूठ जाये I
आज हमने बरसो के बाद अपनी रिश्तो
की अलमारी खोली,
देखा तो बहुत धूल जम आई थी सब
रिश्तो की किताबो पर I
आपका अपना अनुराग "परदेसी"
१३/०६/२०१४