Saturday, 14 June 2014

रिश्तो की अलमारी

रिश्तो की अलमारी
आज हमने बरसो के बाद अपनी रिश्तो की अलमारी खोली,
देखा तो बहुत धूल जम आई थी सब रिश्तो की किताबो पर I

कुछ नयी, कुछ पुरानी,
कुछ रोती, कुछ हँसती,
कुछ घूरती, कुछ सहमी,
कुछ सस्ती, कुछ महंगी,
कुछ सोती, कुछ जागती,
सब किताबे बेतरतीब पड़ी थी I

कुछ अहम की दीमक के कीड़े खा गये, कुछ पर शक़ और परायेपन के जाले लग आये थे I
कुछ बिलकुल ठीक थी, सिर्फ एक दो पन्ने हमारी गलती से मुड़ आये थे I
दूर कोने में जो पड़ी थी, उन पर लिखे अल्फाज मिट आये थे I
ऊपर की कतार में जो नज़दीक थी, नयी थी सिर्फ, उनके ऊपर के पेज फट आये थे I
कुछ पन्नें खुलने का इंतजार करते करते, पड़े पड़े पुराने हो आये थे I
पुरानी को पढ़ना भूल गए थे, हर महीने नयी किताबे खरीद लाये थे I
दुनिया को रिझाने के लिए, कुछ नापसंद किताबे भी खरीद के ले आये थे I
कुछ मनपसंद किताबे, चंद सिक्को की खातिर बाजार में भी बेच आये थे I

आज हमने बरसो के बाद अपनी रिश्तो की अलमारी खोली,
देखा तो बहुत धूल जम आई थी सब रिश्तो की किताबो पर I

पुरानी किताबे है, कुछ को थाम हाथ खुशक, कुछ को पढ़ के आँख नम हो आये I
थोड़ी सी प्यार की धुप लगाने से, किताबो के सारे पन्ने नए हो आये I
बरसो पुरानी पड़ी किताबो के पन्ने, हमारे छूने भर के अहसास से खिल आये I
देर से ही सही, इस बार हम तो अपनी अलमारी खोल के साफ कर आये I 
ज़िन्दगी की लाइब्रेरी में, सब किताबो को उनकी जगह सजा आये
नयी पुरानी सब को खोल के, अपनों के प्यार की हवा लगवा लायेI
अब किताब के दाम से उसकी कीमत नहीं आंकते, जैसा हम बरसो से करते आये I
अब तो आँखों के सामने खोल के रखी, ताकि गलती से फिर धूल जम जाये I
अब किताबे पढ़ते लिखते रहते है, ताकि ज़िन्दगी मुस्कुराती रहे और दोबारा न रूठ जाये I

आज हमने बरसो के बाद अपनी रिश्तो की अलमारी खोली,
देखा तो बहुत धूल जम आई थी सब रिश्तो की किताबो पर I

आपका अपना अनुराग "परदेसी" १३/०६/२०१४


Wednesday, 11 June 2014

ट्रैफिक की बत्ती

ट्रैफिक की बत्ती

बहुत मजा आता था बचपन में जब चौराहे पर देखते थे लाल और हरी बत्ती
मोटे हवलदार के डंडे की जगह अब गयी थी दुबली पतली पर कड़क बत्ती
हमेशा व्यस्त और गुस्से में तनी रहती थी वो चौराहे की बत्ती
तूती बोलती थी उसकी बड़ी ताक़तवर थी वो छोटी सी बत्ती   
स्कूल आते जाते कभी हमको देख के मुस्कुराती थी वो बत्ती
लाल सब को रुकवा दिया करती, और हरी सब को दौड़ा दिया करती थी बत्ती
अपने ही दम पर पूरे चौराहे को हिला दिया दिया करती थी बत्ती
दिन रात, धुप बारिश, बिना सोये हमेशा जागती रहती थी बत्ती
अख़बार,सिगरेट, खिलोने वाले सब को अपने पैरो में जगह देती थी बत्ती 
खुले आसमान के नीचे महारानी जैसे हुकूमत करती थी बत्ती

शहर बड़ा हो गया अब उतना काम नहीं कर पाती थी ट्रैफिक की बत्ती
कभी थक के परेशांन हो जाती, तो जलती बुजती रहती थी बत्ती
खम्बा भी कमजोर हो आया था जिस पर सालो से तनी रहती थी बत्ती
अब उसके ऊपर एक नया पुल बन आया था, बहुत बेबस लगती थी अब बत्ती
पुरानी सड़क पर अब कोई इका दुका साइकिल या रिक्शे ही रोक पाती थी बत्ती
सब पकड़ के निकल गए नया पुल, बहुत अकेली हो आयी थी अब चौराहे की बत्ती
एक दिन पुरानी सड़क किनारे में कचरे की साथ लहूलुहान गिरी पड़ी मिली बत्ती

बरसो के बाद

सरकार ने बत्ती कीजगह शहर के बहुत पुराने नामी गिरामी शायर का पुतला लगाया,
पुतले की नीचे शायर का कलाम  लिखवाया  

कलाम
"ज़िन्दगी की गाड़ी चलती है,कभी धीमी, कभी तेज चलती है
बत्ती लाल होने पर रूकती है, और हरी होने पर फिर चलती है
ज़िन्दगी अब उम्र के ऐसे चौराहे पर है देखो किसके की सहारे चलती है
जवानी की नयी सड़क पर, दुसरो की भी हमारे इशारे से चलती है
बुढ़ापे की टूटी सड़क पर तो अपनी ही बहुत मुश्किल से चलती है
पता नहीं कब हरी से हमेशा के लिए लाल हो जाये, देखो कब तक चलती है”


आपका अपना अनुराग "परदेसी" १०/०६/२०१४   

ट्रैफिक की बत्ती

ट्रैफिक की बत्ती

बहुत मजा आता था बचपन में जब चौराहे पर देखते थे लाल और हरी बत्ती
मोटे हवलदार के डंडे की जगह अब गयी थी दुबली पतली पर कड़क बत्ती
हमेशा व्यस्त और गुस्से में तनी रहती थी वो चौराहे की बत्ती
तूती बोलती थी उसकी बड़ी ताक़तवर थी वो छोटी सी बत्ती   
स्कूल आते जाते कभी हमको देख के मुस्कुराती थी वो बत्ती
लाल सब को रुकवा दिया करती, और हरी सब को दौड़ा दिया करती थी बत्ती
अपने ही दम पर पूरे चौराहे को हिला दिया दिया करती थी बत्ती
दिन रात, धुप बारिश, बिना सोये हमेशा जागती रहती थी बत्ती
अख़बार,सिगरेट, खिलोने वाले सब को अपने पैरो में जगह देती थी बत्ती 
खुले आसमान के नीचे महारानी जैसे हुकूमत करती थी बत्ती

शहर बड़ा हो गया अब उतना काम नहीं कर पाती थी ट्रैफिक की बत्ती
कभी थक के परेशांन हो जाती, तो जलती बुजती रहती थी बत्ती
खम्बा भी कमजोर हो आया था जिस पर सालो से तनी रहती थी बत्ती
अब उसके ऊपर एक नया पुल बन आया था, बहुत बेबस लगती थी अब बत्ती
पुरानी सड़क पर अब कोई इका दुका साइकिल या रिक्शे ही रोक पाती थी बत्ती
सब पकड़ के निकल गए नया पुल, बहुत अकेली हो आयी थी अब चौराहे की बत्ती
एक दिन पुरानी सड़क किनारे में कचरे की साथ लहूलुहान गिरी पड़ी मिली बत्ती

बरसो के बाद

सरकार ने बत्ती कीजगह शहर के बहुत पुराने नामी गिरामी शायर का पुतला लगाया,
पुतले की नीचे शायर का कलाम  लिखवाया  

कलाम
"ज़िन्दगी की गाड़ी चलती है,कभी धीमी, कभी तेज चलती है
बत्ती लाल होने पर रूकती है, और हरी होने पर फिर चलती है
ज़िन्दगी अब उम्र के ऐसे चौराहे पर है देखो किसके की सहारे चलती है
जवानी की नयी सड़क पर, दुसरो की भी हमारे इशारे से चलती है
बुढ़ापे की टूटी सड़क पर तो अपनी ही बहुत मुश्किल से चलती है
पता नहीं कब हरी से हमेशा के लिए लाल हो जाये, देखो कब तक चलती है”


आपका अपना अनुराग "परदेसी" १०/०६/२०१४   

Tuesday, 10 June 2014

आम अभी कच्चे है

आम अभी कच्चे है 

इस बरस कहते है फसल अच्छी है, आम बहुत जल्दी पक आये है I 
चख के देखे तो अभी थोड़े कच्चे थोड़े खटे थे, आम पक आये है II

बहुत अर्से के बाद हमारे घर आज कुछ खास मेहमान आये है I
दरवाजे से ही मिल के लौट गए, हमारे आज कुछ खास मेहमान आये है II

हम कही डूब न जाये, वो हमारे लिए नयी किश्ती ले के आये है I
किश्ती में सुराख़ हैं, ताकि हम प्यासे न रह जाये, वो किश्ती ले के आये है II

हम बाजार से आज नई चमकती हांड़ी खरीद के ले आये है I
चूहले में आग कब से बुज चुकी, हम हांड़ी खरीद के ले आये है II

पुराने शहर की मिठाई बहुत मशहूर थी, वो आज फिर खाने आये है I
मिठाई अब कब से नमकीन हो चुकी, वो फिर आज मिठाई खाने आये है II

वो आज हमारी चोखट पर अपनी बारात सजा के आये है I
हमारी डोली कब की उठ चुकी, वो बारात ले के आये है II

महलो में महफिले जमा करती थी, आज वो फिर महफ़िल सजाने आये है I
महल अब कब के खंडहर हो चुके, वो महफिले सजाने आये है II

उनके सवाल खत्म ही नहीं होते, वो फिर सवाल पूछने आये है I
हम सारे ज़वाब दे चुके कब से, वो सवाल पूछने आये है II

इस बरस कहते है फसल अच्छी है, आम बहुत जल्दी पक आये है I
चख के देखे तो अभी थोड़े कच्चे, थोड़े खटे थे, आम पक आये है II

आपका अपना अनुराग "परदेसी" ०६/०६/२०१४

Saturday, 7 June 2014

हकीकत

हकीकत

पेड़ो से सूख के झड़े पत्ते, पेड़ो के नीचे ही गिरे मिलते है 
तेज हवाओं से डरते है बेचारे, इसलिए सहमे और डरे मिलते है
कुछ दोबारा हरे हो कर किसी शाख पर लटकने की उम्मीद रखते है,
कुछ अपने अंतिम दिनों में, पेड से थोड़ी ठंडी छाँव की उम्मीद रखते है
पेड़ो से सूख के झड़े पत्ते, पेड़ो के नीचे ही गिरे मिलते है 

आँख से निकले आंसू, आँख से निकले आंसू, गालो पर ही बहे मिलते है
कुछ सूख कर हमारी गालो पर नमक बन जाने की उम्मीद रखते है
कुछ बहते बहते हमारे दिल तक पहुंच जाने की उम्मीद रखते है
पेड़ो से सूख के झड़े पत्ते, पेड़ो के नीचे ही गिरे मिलते है 
तेज हवाओं से डरते है बेचारे, इसलिए सहमे और डरे मिलते है

चिराग तले चाहे कितना अँधेरा हो ऊपर तो हमेशा दीये जले मिलते है
मंदिर मस्जिद में मत ढूंढो, भगवान तुमको हमेशा तुम्हारे अंदर मिलते है
उम्र भर तलाशते रहो सकून को पुरे सकून तो दो गज़ ज़मीन में ही मिलते है  
पेड़ो से सूख के झड़े पत्ते, पेड़ो के नीचे ही गिरे मिलते है 
तेज हवाओं से डरते है बेचारे, इसलिए सहमे और डरे मिलते है

अपने बिछड़ जाने के बाद भी हमेशा अपने दिल के किसी कोने में मिलते है
कीमती मोती कभी कभी गहरे समुन्दर में नहीं, रेत के नीचे दफ़न मिलते है
सच्चे प्यार करने वाले, हमेशा किनारे पर खड़े इंतजार करते हुए मिलते है
पेड़ो से सूख के झड़े पत्ते, पेड़ो के नीचे ही गिरे मिलते है 
तेज हवाओं से डरते है बेचारे, इसलिए सहमे और डरे मिलते है


आपका अपना अनुराग  " परदेसी" ०५/०६/२०१४

Friday, 6 June 2014

खो गयी मेरी आवाज

खो गयी मेरी आवाज 

बहुत मुश्किल में हूँ मैं आज, बहुत मुश्किल में हूँ मैं आज 
हिम्मत नहीं है अपने से ही अपनी आँख मिलाने की आज

अपने से ही चुरा रहा हूँ, और अपनों से चुरा रहा आँखे आज 
कोशिश भी करू, खोल नहीं सकता आपके सामने अपना राज
चुप ऐसा हुआ हूँ, नहीं बजता अब कोई अपना नया पुराना साज
दिन भर बोलता था, न जाने कहा खो गयी मेरी खुद की आवाज 


थमने का नाम नहीं ले रहे, नींद में भी टपक जाते है आंसू चार
जिनको कभी सपने में भी नहीं दिया, उनको दे दिया दर्द बेशुमार
अब तक जीतने का था घुमान, इस बार अपने से ही हुई अपनी हार
दिल अपनों का दुखाया, शिदत से इंतजार है अपनी सजा का इस बार

बहुत मुश्किल में हूँ मैं आज, बहुत मुश्किल में हूँ मैं आज
हिम्मत नहीं है अपने से ही अपनी आँख मिलाने की आज

रात काली अँधेरी थी, पर अब दिन में भी नहीं दिखता है उजाला
आईने के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं, चहेरा हो चुका है काला
उनकी ही मुस्कराहट छीन ली हमने, जिनको हमने उमर भर था संभाला
उम्मीद नहीं वो वापिस आयेगा फिर कभी जो बीत गया वक़्त मतवाला

बहुत मुश्किल में हूँ मैं आज, बहुत मुश्किल में हूँ मैं आज
हिम्मत नहीं है अपने से ही अपनी आँख मिलाने की आज

मेहनत,प्यार से पिरोया अपनी ज़िन्दगी का हार आज टूट गया
हार का एक एक फूल देखते ही देखते अपने हाथो से छूट गया
आवाज बंद,चहेरा काला, अपनी ठोकर से अपना ही घर टूट गया
कुछ न कर सका, हर कोई हमसे आज हमेशा के लिए छूट गया

बहुत मुश्किल में हूँ मैं आज, बहुत मुश्किल में हूँ मैं आज
हिम्मत नहीं है अपने से ही अपनी आँख मिलाने की आज

Aapka Apna Anurag " Pardesi" 02/06/2014

हत्या का बीज

हत्या का बीज 

आज बहुत खुश थे वो,
आज वो बाजार से बीज लाये थे I
बड़े प्यार से बोते थे वो 
आज वो बाजार से बीज लाये थे I
कब से इंतजार में थे वो,
आज वो बाजार से बीज लाये थे I
हर रोज पानी देते थे वो,
आज वो बाजार से बीज लाये थे I
बड़े ध्यान से रखते थे वो,
आज वो बाजार से बीज लाये थे I

सूरज की पहली किरण निकलते,
मासूम नन्नी कलियाँ खिल आई थी I
कलियों का लाल रंग देखते,
उनकी आँखे लाल हो आई थी I
आँगन में फूल नहीं खिलते,
तलवार की दार तेज हो आई थी I
अब पूरे दिन भी नहीं ढलते,
पैदा होने से पहले उनकी मौत आई थी I
अब माली पर लोग भरोसे नहीं करते,
बगीचे की सब कलियाँ मुरझा आई थी I

अगर फूलों की कदर न हो, तो तुम क्यों बीज बोते हो I
रंग देख कर फूल चुनते हो, तो तुम क्यों बीज बोते हो I
जब तुम खुद बंज़र हो, तो तुम क्यों बीज बोते हो I

दुनिया में सब रंग के फूल हो तो, तभी तो बाग़ अच्छे लगते है I
बगीचे में सब फूल खिले हो, तभी तो बगीचे सुन्दर लगते है I

Trigger for this one is – Female Foeticide (कन्या भ्रुण हत्या)

आपका अपना अनुराग "परदेसी" ३०/०५/१४